गुरु तिय पद बन्दे दुहुँ भाई । सहित बिप्र लिय जे सँग आई ॥
गंग गौरि सम सब सनमानीं । देहिँ असीस मुदित मृदु बानी ॥
guru tiya pada bande duhum̐ bhāī | sahita bipra liya je sam̐ga āī ||
gaṃga gauri sama saba sanamānīṃ | dehim̐ asīsa mudita mṛdu bānī ||
5 श्लोक · 245 में से 326
दोनों भाई गुरुपत्नी के और साथ आई ब्राह्मणियों के चरणों की वंदना करते हैं और आशीर्वाद पाते हैं। फिर वे सुमित्रा के पैर पकड़कर उनकी गोद से लिपट जाते हैं, जैसे किसी कंगाल को बड़ी संपत्ति मिली हो। फिर दोनों भाई माता कौसल्या के चरणों में गिरते हैं। सब माताएँ प्रेम से व्याकुल हैं, हृदय से लगाकर उन्हें आँसुओं से नहला देती हैं। उस समय का हर्ष और विषाद कवि कैसे कहे, जैसे गूँगा स्वाद नहीं कह सकता। माताओं से मिलकर राम गुरु से आश्रम पधारने को कहते हैं। मुनि की आज्ञा पाकर पुरजन जल और स्थल देख देखकर उतरते हैं। भरत, लक्ष्मण और राम ब्राह्मणों, मंत्रियों, माताओं और गुरु को साथ लेकर पावन आश्रम जाते हैं।
गुरु तिय पद बन्दे दुहुँ भाई । सहित बिप्र लिय जे सँग आई ॥
गंग गौरि सम सब सनमानीं । देहिँ असीस मुदित मृदु बानी ॥
guru tiya pada bande duhum̐ bhāī | sahita bipra liya je sam̐ga āī ||
gaṃga gauri sama saba sanamānīṃ | dehim̐ asīsa mudita mṛdu bānī ||
गहि पद लगे सुमित्रा अङ्का । जनु भेटीं सम्पति अति रङ्का ॥
पुनि जननी चरनन्हि दोउ भ्राता । परे प्रेम व्याकुल सब माता ॥
gahi pada lage sumitrā aṅkā | janu bheṭīṃ sampati ati raṅkā ||
puni jananī carananhi dou bhrātā | pare prema vyākula saba mātā ||
अति अनुराग अम्ब उर लाये । नयन सनेह सलिल अन्हवाये ॥
तेहि अवसर कर हरष बिषादू । किमि कवि कहइ मूक जिमि स्वादू ॥
ati anurāga amba ura lāye | nayana saneha salila anhavāye ||
tehi avasara kara haraṣa biṣādū | kimi kavi kahai mūka jimi svādū ||
मिलि जननिहि सानुज रघुराऊ । गुरु सन कहेउ कि धारिअ पाऊ ॥
पुरजन पाइ मुनीस नियोगू । जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू ॥
mili jananihi sānuja raghurāū | guru sana kaheu ki dhāria pāū ||
purajana pāi munīsa niyogū | jala thala taki taki utareu logū ||
महिसुर मन्त्री मातु गुरु, गने लोग लिए साथ ।
पावन आश्रम गवन किय, भरत लखन रघुनाथ ॥
mahisura mantrī mātu guru, gane loga lie sātha |
pāvana āśrama gavana kiya, bharata lakhana raghunātha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0