मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी । कवि-कुल-अगम करम मन बानी ॥
परम पेम पूरन दोउ भाई । मन बुधि चित अहमिति बिसराई ॥
milani prīti kimi jāi bakhānī | kavi-kula-agama karama mana bānī ||
parama pema pūrana dou bhāī | mana budhi cita ahamiti bisarāī ||
5 श्लोक · 241 में से 326
उस मिलन की प्रीति कैसे कही जाए? वह कर्म, मन और वाणी से कविकुल के लिए अगम है। दोनों भाई परम प्रेम से भरे हैं, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार भूल गए हैं। कवि के पास अर्थ और अक्षर का ही सच्चा बल है, नट ताल की गति पर ही नाचता है। भरत और रघुवर का स्नेह ऐसा अगम है जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश का मन भी नहीं जाता। तुलसीदास कहते हैं, मैं कुबुद्धि उसे कैसे कहूँ, क्या गाँडर घास की ताँत पर अच्छा राग बज सकता है? यह मिलन देखकर देवता भयभीत होते हैं। देवगुरु के समझाने पर वे जागते हैं और फूल बरसाकर प्रशंसा करते हैं। राम शत्रुघ्न और फिर केवट से भेंटते हैं। लक्ष्मण प्रणाम करते हैं और भरत उनसे बड़े भाव से मिलते हैं।
मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी । कवि-कुल-अगम करम मन बानी ॥
परम पेम पूरन दोउ भाई । मन बुधि चित अहमिति बिसराई ॥
milani prīti kimi jāi bakhānī | kavi-kula-agama karama mana bānī ||
parama pema pūrana dou bhāī | mana budhi cita ahamiti bisarāī ||
कहहु सुपेम प्रगट को करई । केहि छाया कबि मति अनुसरई ॥
कविहि अरथ आखर बल साँचा । अनुहरि ताल गतिहि नट नाचा ॥
kahahu supema pragaṭa ko karaī | kehi chāyā kabi mati anusaraī ||
kavihi aratha ākhara bala sām̐cā | anuhari tāla gatihi naṭa nācā ||
अगम सनेह भरत रघुबर को । जहँ न जाइ मन विधि-हरि-हर को ॥
सो मैं कुमति कहउँ केहि भाँती । बाज सुराग कि गाँडर ताँती ॥
agama saneha bharata raghubara ko | jaham̐ na jāi mana vidhi-hari-hara ko ||
so maiṃ kumati kahaum̐ kehi bhām̐tī | bāja surāga ki gām̐ḍara tām̐tī ||
मिलनि बिलोकि भरत रघुवर की । सुर-गन सभय धकधकी घर की ॥
समुझाये सुरगुरु जड़ जागे । बरषि प्रसून प्रसंसन लागे ॥
milani biloki bharata raghuvara kī | sura-gana sabhaya dhakadhakī ghara kī ||
samujhāye suraguru jar̤a jāge | baraṣi prasūna prasaṃsana lāge ||
मिलि सपेम रिपुसूदनहिँ, केवट भेंटेउ राम ।
भूरि भायँ भेंटे भरत, लछिमन करत प्रनाम ॥
mili sapema ripusūdanahim̐, kevaṭa bheṃṭeu rāma |
bhūri bhāyam̐ bheṃṭe bharata, lachimana karata pranāma ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0