देवता कहते हैं, यदि जग में भरत का जन्म न होता तो धर्म की धुरी को कौन धारण करता? भरत के गुण कवियों के लिए भी अगम हैं, हे रघुनाथ, आपके बिना उन्हें कौन जाने? राम, लक्ष्मण और सीता को अकथ सुख मिलता है। इधर भरत सबके साथ पवित्र मन्दाकिनी में स्नान करते हैं। सब लोगों को नदी के पास ठहराकर, माताओं, गुरु और मंत्रियों से आज्ञा लेकर वे गुह और छोटे भाई के साथ सीता और रघुराई की ओर चलते हैं। माता की करनी याद कर सकुचाते हैं और मन में कुतर्क करते हैं। कहीं राम, लक्ष्मण और सीता मेरा नाम सुनकर यह स्थान छोड़ अन्यत्र न चले जाएँ। मुझे माता के मत में मानकर जो करें सो थोड़ा। या अपनी ओर देखकर मेरे पाप क्षमा कर आदर दें।
जौं न होत जग जनम भरत को । सकल धरम-धुर-धरनि धरत को ॥ कबि-कुल-अगम भरत-गुन गाथा । को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा ॥
jauṃ na hota jaga janama bharata ko | sakala dharama-dhura-dharani dharata ko || kabi-kula-agama bharata-guna gāthā | ko jānai tumha binu raghunāthā ||