अयोध्याकाण्ड

अध्याय 233: भरत मन्दाकिनी में नहाकर आगे बढ़ते हैं

5 श्लोक · 233 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत मन्दाकिनी में नहाकर आगे बढ़ते हैं

देवता कहते हैं, यदि जग में भरत का जन्म न होता तो धर्म की धुरी को कौन धारण करता? भरत के गुण कवियों के लिए भी अगम हैं, हे रघुनाथ, आपके बिना उन्हें कौन जाने? राम, लक्ष्मण और सीता को अकथ सुख मिलता है। इधर भरत सबके साथ पवित्र मन्दाकिनी में स्नान करते हैं। सब लोगों को नदी के पास ठहराकर, माताओं, गुरु और मंत्रियों से आज्ञा लेकर वे गुह और छोटे भाई के साथ सीता और रघुराई की ओर चलते हैं। माता की करनी याद कर सकुचाते हैं और मन में कुतर्क करते हैं। कहीं राम, लक्ष्मण और सीता मेरा नाम सुनकर यह स्थान छोड़ अन्यत्र न चले जाएँ। मुझे माता के मत में मानकर जो करें सो थोड़ा। या अपनी ओर देखकर मेरे पाप क्षमा कर आदर दें।

233.1

जौं न होत जग जनम भरत को । सकल धरम-धुर-धरनि धरत को ॥
कबि-कुल-अगम भरत-गुन गाथा । को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा ॥

jauṃ na hota jaga janama bharata ko | sakala dharama-dhura-dharani dharata ko ||
kabi-kula-agama bharata-guna gāthā | ko jānai tumha binu raghunāthā ||

233.2

लखन-राम-सियँ सुनि सुर-बानी । अति सुख लहेउ न जाइ बखानी ॥
इहाँ भरत सब सहित सहाये । मंदाकिनीं पुनीत नहाये ॥

lakhana-rāma-siyam̐ suni sura-bānī | ati sukha laheu na jāi bakhānī ||
ihām̐ bharata saba sahita sahāye | maṃdākinīṃ punīta nahāye ||

233.3

सरित समीप राखि सब लोगा । माँगि मातु गुरु सचिव नियोगा ॥
चले भरत जहँ सिय-रघुराई । साथ निषादनाथ लघु भाई ॥

sarita samīpa rākhi saba logā | mām̐gi mātu guru saciva niyogā ||
cale bharata jaham̐ siya-raghurāī | sātha niṣādanātha laghu bhāī ||

233.4

समुझि मातु करतब सकुचाहीं । करत कुतरक कोटि मन माहीं ॥
राम-लखन-सिय सुनि मम नाऊँ । उठि जनि अनत जाहिँ तजि ठाऊँ ॥

samujhi mātu karataba sakucāhīṃ | karata kutaraka koṭi mana māhīṃ ||
rāma-lakhana-siya suni mama nāūm̐ | uṭhi jani anata jāhim̐ taji ṭhāūm̐ ||

दो॰ 233दोहा

मातु मते महँ मानि मोहि, जो कछु करहिँ सो थोर ।
अघ अवगुन छमि आदरहिं, समुझि आपनी ओर ॥

mātu mate maham̐ māni mohi, jo kachu karahim̐ so thora |
agha avaguna chami ādarahiṃ, samujhi āpanī ora ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0