अयोध्याकाण्ड

अध्याय 234: राम की ओर भरत के ठिठकते कदम

5 श्लोक · 234 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

राम की ओर भरत के ठिठकते कदम

भरत सोचते हैं, चाहे मुझे मलिन मन जानकर त्याग दें, चाहे सेवक मानकर आदर दें, मेरी शरण तो राम की पनही ही है। राम अच्छे स्वामी हैं, दोष सब इस दास का है। जग में चातक और मछली अपने नेम और प्रेम के लिए यश के भागी हैं। यह गुनते वे चलते हैं, संकोच और स्नेह से अंग शिथिल हैं। माता का किया दोष मन को पीछे फेरता है, भक्ति का बल धीरज देकर आगे चलाता है। जब रघुनाथ का स्वभाव याद आता है, तब पैर जल्दी पड़ते हैं। उस समय भरत की दशा जलधारा में जल के भौंरे जैसी है। यह देखकर निषादराज देह की सुध भूल जाते हैं। मंगल शकुन होने लगते हैं, निषाद विचारकर कहते हैं, सोच मिटेगा, हर्ष होगा, पर अंत में विषाद रहेगा।

234.1

जौँ परिहरहिं मलिन मन जानी । जौँ सन मोनहिँ मानी ॥
मोरें सरन रामहि की पनहीं । राम सुस्वामि दोष सब जनहीं ॥

jaum̐ pariharahiṃ malina mana jānī | jaum̐ sana monahim̐ mānī ||
moreṃ sarana rāmahi kī panahīṃ | rāma susvāmi doṣa saba janahīṃ ||

234.2

जग जस-भाजन चातक मीना । नेम पेम निज निपुन नबीना ॥
अस मन गुनत चले मग जाता । सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता ॥

jaga jasa-bhājana cātaka mīnā | nema pema nija nipuna nabīnā ||
asa mana gunata cale maga jātā | sakuca saneham̐ sithila saba gātā ||

234.3

फेरत मनहिँ मातु-कृत खोरी । चलत भगति-बल धीरज-धोरी ॥
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ । तब पथ परत उताइल पाऊ ॥

pherata manahim̐ mātu-kṛta khorī | calata bhagati-bala dhīraja-dhorī ||
jaba samujhata raghunātha subhāū | taba patha parata utāila pāū ||

234.4

भरत दसा तेहि अवसर कैसी । जल प्रबाहँ जल-अलि गति जैसी ॥
देखि भरत कर सोच सनेहू । भा निषाद तेहि समयँ विदेहू ॥

bharata dasā tehi avasara kaisī | jala prabāham̐ jala-ali gati jaisī ||
dekhi bharata kara soca sanehū | bhā niṣāda tehi samayam̐ videhū ||

दो॰ 234दोहा

लगे होन मङ्गल सगुन, सुनि गुनि कहत निषाद ।
मिटिहि सोच होइहि हरष, पुनि परिनाम बिषाद ॥

lage hona maṅgala saguna, suni guni kahata niṣāda |
miṭihi soca hoihi haraṣa, puni parināma biṣāda ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0