अयोध्याकाण्ड

अध्याय 232: राम भरत को रघुकुल का हंस कहते हैं

5 श्लोक · 232 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

राम भरत को रघुकुल का हंस कहते हैं

राम असंभव बातें गिनाते हैं। चाहे अँधेरा दोपहर के सूर्य को निगल ले, चाहे बादल आकाश में न मिले, चाहे अगस्त्य गाय के खुर भर जल में डूब जाएँ, चाहे पृथ्वी अपनी सहज क्षमा छोड़ दे, चाहे मच्छर की फूँक से सुमेरु उड़ जाए, पर भाई, भरत को राजमद नहीं हो सकता। लक्ष्मण, तुम्हारी और पिता की शपथ, भरत जैसा पवित्र और अच्छा भाई नहीं। विधाता गुण रूपी दूध और अवगुण रूपी जल मिलाकर संसार रचता है। भरत सूर्यवंश रूपी तालाब में हंस होकर जन्मे और गुण दोष को अलग कर दिया। गुण का दूध लेकर, अवगुण का जल छोड़कर, उन्होंने जग में अपना यश उजला किया। यह कहते हुए रघुराज प्रेमसागर में डूब जाते हैं। देवता यह प्रेम देखकर सराहते हैं कि राम सा कृपालु कौन है।

232.1

तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई । गगन मग न मकु मेघहिं मिलई ॥
गो-पद जल बूड़हिँ घटजोनी । सहज छमा बरु छाड़ै छोनी ॥

timiru taruna taranihi maku gilaī | gagana maga na maku meghahiṃ milaī ||
go-pada jala būr̤ahim̐ ghaṭajonī | sahaja chamā baru chār̤ai chonī ||

232.2

मसक फूंक मकु मेरु उड़ाई । होइ न नृप-मद भरतहि भाई ॥
लखन तुम्हार सपथ पितु आना । सुचि सुबन्धु नहिँ भरत समाना ॥

masaka phūṃka maku meru ur̤āī | hoi na nṛpa-mada bharatahi bhāī ||
lakhana tumhāra sapatha pitu ānā | suci subandhu nahim̐ bharata samānā ||

232.3

सगुन-खीरु अवगुन-जल ताता । मिलइ रचइ परपञ्च विधाता ॥
भरत हंस रबि-बंस-तड़ागा । जनमि कीन्ह गुन-दोष-विभागा ॥

saguna-khīru avaguna-jala tātā | milai racai parapañca vidhātā ||
bharata haṃsa rabi-baṃsa-tar̤āgā | janami kīnha guna-doṣa-vibhāgā ||

232.4

गहि गुन-पय तजि अवगुन-बारी । निज जस जगत कीन्हि उजिआरी ॥
कहत भरत गुन-सील-सुभाऊ । प्रेम-पयोधि मगन रघुराऊ ॥

gahi guna-paya taji avaguna-bārī | nija jasa jagata kīnhi ujiārī ||
kahata bharata guna-sīla-subhāū | prema-payodhi magana raghurāū ||

दो॰ 232दोहा

सुनि रघुवर-बानी बिबुध, देखि भरत पर हेतु ।
सकल सराहत राम सो, प्रभु को कृपानिकेतु ॥

suni raghuvara-bānī bibudha, dekhi bharata para hetu |
sakala sarāhata rāma so, prabhu ko kṛpāniketu ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0