जगु भय मगन गगन भइ बानी । लखन बाहु-बल बिपुल बखानी ॥
तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा । को कहि सकइ को जान निहारा ॥
jagu bhaya magana gagana bhai bānī | lakhana bāhu-bala bipula bakhānī ||
tāta pratāpa prabhāu tumhārā | ko kahi sakai ko jāna nihārā ||
5 श्लोक · 231 में से 326
संसार भयभीत है, तभी आकाशवाणी होती है जो लक्ष्मण के बाहुबल की बड़ाई करती है। तात, तुम्हारा प्रताप और प्रभाव कौन कह सकता है? पर कोई भी काम, उचित हो या अनुचित, सब कहते हैं कि सोच समझकर करो। जो सहसा करके पीछे पछताते हैं, वेद और विद्वान उन्हें बुद्धिमान नहीं कहते। देवताओं की वाणी सुनकर लक्ष्मण सकुचा जाते हैं, राम और सीता उनका आदर करते हैं। राम कहते हैं, भाई, तुमने सुंदर नीति कही। राजमद सबसे कठिन है। जिन्होंने साधुसभा का सेवन नहीं किया, वे राजा उसे पीते ही मतवाले हो जाते हैं। पर सुनो लक्ष्मण, विधाता की सृष्टि में भरत जैसा न सुना न देखा। ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पद पाकर भी भरत को राजमद नहीं होगा। क्या काँजी की बूँद से क्षीरसागर फट सकता है?
जगु भय मगन गगन भइ बानी । लखन बाहु-बल बिपुल बखानी ॥
तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा । को कहि सकइ को जान निहारा ॥
jagu bhaya magana gagana bhai bānī | lakhana bāhu-bala bipula bakhānī ||
tāta pratāpa prabhāu tumhārā | ko kahi sakai ko jāna nihārā ||
अनुचित उचित काज कछु होऊ । समुझि करिअ भल कह सब कोऊ ॥
सहसा करि पाछे पछिताहीँ । कहहिँ बेद-बुध ते बुध नाहीॅ ॥
anucita ucita kāja kachu hoū | samujhi karia bhala kaha saba koū ||
sahasā kari pāche pachitāhīm̐ | kahahim̐ beda-budha te budha nāhīॅ ||
सुनि सुर-बचन लखन सकुचाने । राम-सीयँ सादर सनमाने ॥
कही तात तुम्ह नीति सुहाई । सब तेँ कठिन राज मद भाई ॥
suni sura-bacana lakhana sakucāne | rāma-sīyam̐ sādara sanamāne ||
kahī tāta tumha nīti suhāī | saba tem̐ kaṭhina rāja mada bhāī ||
जो अचवँत नृप मातहिं तेई । नाहिँ न साधु-समा जेहिं सेई ॥
सुनहु लखन भल भरत सरीसा । बिधि प्रपञ्च महँ सुना न दीसा ॥
jo acavam̐ta nṛpa mātahiṃ teī | nāhim̐ na sādhu-samā jehiṃ seī ||
sunahu lakhana bhala bharata sarīsā | bidhi prapañca maham̐ sunā na dīsā ||
भरतहि होइ न राजमद, विधि हरि हर पद पाइ ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि, छीरसिन्धु बिनसाइ ॥
bharatahi hoi na rājamada, vidhi hari hara pada pāi |
kabahum̐ ki kām̐jī sīkarani, chīrasindhu binasāi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0