अयोध्याकाण्ड

अध्याय 230: लक्ष्मण शस्त्र सजाकर युद्ध की शपथ लेते हैं

5 श्लोक · 230 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

लक्ष्मण शस्त्र सजाकर युद्ध की शपथ लेते हैं

लक्ष्मण उठकर हाथ जोड़ते हैं और आज्ञा माँगते हैं, मानो सोया वीररस जाग उठा हो। सिर पर जटा बाँधते हैं, कमर में तरकश कसते हैं, धनुष और बाण हाथ में सजाते हैं। कहते हैं, आज राम के सेवक का यश लूँगा और भरत को युद्ध में सीख दूँगा। राम के निरादर का फल पाकर दोनों भाई रणशय्या पर सोएँगे। अच्छा हुआ कि सारा समाज आ गया, आज पिछला क्रोध प्रकट करूँगा। जैसे सिंह हाथियों के झुंड को रौंदता है और बाज़ लवा को लपेट लेता है, वैसे ही सेना और भाई सहित भरत को तिरस्कार कर रणभूमि में गिराऊँगा। यदि शंकर भी सहायता को आएँ तो भी राम की दुहाई, मारूँगा। लक्ष्मण का क्रोध और शपथ देखकर सब लोक और लोकपाल डरकर भागना चाहते हैं।

230.1

उठि कर जोरि रजायसु माँगा । मनहुँ बीर रस सोवत जागा ॥
बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा । साजि सरासन-सायक हाथा ॥

uṭhi kara jori rajāyasu mām̐gā | manahum̐ bīra rasa sovata jāgā ||
bām̐dhi jaṭā sira kasi kaṭi bhāthā | sāji sarāsana-sāyaka hāthā ||

230.2

आजु राम-सेवक जस, लेऊँ । भरतहि समर सिखावन देऊँ ॥
राम निरादर कर फल पाई । सोवहुँ समर-सेज दोउ भाई ॥

āju rāma-sevaka jasa, leūm̐ | bharatahi samara sikhāvana deūm̐ ||
rāma nirādara kara phala pāī | sovahum̐ samara-seja dou bhāī ||

230.3

आइ बना भल सकल समाजू । प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू ॥
जिमि करि निकर दलइ मृगराजू । लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू ॥

āi banā bhala sakala samājū | pragaṭa karaum̐ risa pāchila ājū ||
jimi kari nikara dalai mṛgarājū | lei lapeṭi lavā jimi bājū ||

230.4

तैसेहिं भरतहि सेन समेता । सानुज निदरि निपातउँ खेता ॥
जौं सहाय कर सङ्कर आई । तौ मारउँ रन राम दोहाई ॥

taisehiṃ bharatahi sena sametā | sānuja nidari nipātaum̐ khetā ||
jauṃ sahāya kara saṅkara āī | tau māraum̐ rana rāma dohāī ||

दो॰ 230दोहा

अति सरोष माखे लखन, लखि सुनि सपथ प्रवान ।
सभय लोक सब लोकपति, चाहत मारि भगान ॥

ati saroṣa mākhe lakhana, lakhi suni sapatha pravāna |
sabhaya loka saba lokapati, cāhata māri bhagāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0