इस अध्याय में क्या होता है सीता का स्वप्न और उत्तर दिशा की धूल प्रेम से शिथिल समाज साँझ तक दो ही कोस चल पाता है और रात वहीं बिताता है। उधर चित्रकूट में भोर से पहले सीता स्वप्न बताती हैं कि भरत समाज सहित आए हैं, वियोग में तपे हुए, सब दुखी, और सासुएँ बदले रूप में दिखीं। यह सुनकर शोक हरने वाले राम स्वयं सोच में पड़ जाते हैं। लक्ष्मण कहते हैं, यह स्वप्न अच्छा नहीं, कोई कठिन समाचार सुनाएगा। राम स्नान करके शिवजी का पूजन करते हैं और मुनियों का सम्मान करते हैं। उत्तर की ओर आकाश में धूल है, पक्षी और मृग व्याकुल होकर भाग रहे हैं। तभी कोल और किरात सारा समाचार कहते हैं, और वह मंगल वचन सुनकर प्रभु पुलकित हो जाते हैं, कमल नेत्रों में प्रेम का जल भर आता है।
226.1 सकल सनेह सिथिल रघुबर कें । गये कोस दुइ दिनकर ढरकें ॥ जल थल देखि बसे निसि बीतें । कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें ॥
sakala saneha sithila raghubara keṃ | gaye kosa dui dinakara ḍharakeṃ || jala thala dekhi base nisi bīteṃ | kīnha gavana raghunātha pirīteṃ ||
226.2 उहाँ राम रजनी-अवसेखा । जागे सीयँ सपन अस देखा ॥ सहित समाज भरत जनु आये । नाथ बियोग ताप तन ताये ॥
uhām̐ rāma rajanī-avasekhā | jāge sīyam̐ sapana asa dekhā || sahita samāja bharata janu āye | nātha biyoga tāpa tana tāye ||
226.3 सकल मलिन मन दीन दुखारी । देखीं सासु आन अनुहारी ॥ सुनि सिय सपन भरे जल लोचन । भये सोच-बस सोच-विमोचन ॥
sakala malina mana dīna dukhārī | dekhīṃ sāsu āna anuhārī || suni siya sapana bhare jala locana | bhaye soca-basa soca-vimocana ||
226.4 लखन सपन यह नीक न होई । कठिन कुचाह सुनाइहि कोई ॥ अस कहि बन्धु समेत नहाने । पूजि पुरारि साधु सनमाने ॥
lakhana sapana yaha nīka na hoī | kaṭhina kucāha sunāihi koī || asa kahi bandhu sameta nahāne | pūji purāri sādhu sanamāne ||
226.छं॰ 1 छन्द सनमानि सुर मुनि-बन्दि बैठे, उत्तर दिसि देखत भये । नभ धूरि खग मृग भूरि भागे, बिकल प्रभु आश्रम गये ॥ तुलसी उठे अवलोकि कारन, काह चित सचकित रहे । सब समाचार किरात कोलन्हि, आइ तेहि अवसर कहे ॥
sanamāni sura muni-bandi baiṭhe, uttara disi dekhata bhaye | nabha dhūri khaga mṛga bhūri bhāge, bikala prabhu āśrama gaye || tulasī uṭhe avaloki kārana, kāha cita sacakita rahe | saba samācāra kirāta kolanhi, āi tehi avasara kahe ||
226.सो॰ 226 सोरठा सुनत सुमङ्गल बैन, मन-प्रमोद तन-पुलक-भर । सरद सरोरुह नैन, तुलसी भरे सनेह-जल ॥
sunata sumaṅgala baina, mana-pramoda tana-pulaka-bhara | sarada saroruha naina, tulasī bhare saneha-jala ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0
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