अयोध्याकाण्ड

अध्याय 214: सिद्धियाँ स्वर्ग सा डेरा रचती हैं

5 श्लोक · 214 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

सिद्धियाँ स्वर्ग सा डेरा रचती हैं

ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ मुनि की वाणी सिर पर रखकर अपने को बड़भागिनी मानती हैं। मुनि के चरणों की वन्दना करके आज वही करें जिससे सारा राजसमाज सुखी हो। यह कहकर वे अनेक सुन्दर घर रचती हैं, जिन्हें देखकर विमान भी बिलखते हैं। उनमें भोग और ऐश्वर्य भरपूर भर देती हैं, जिन्हें देखकर देवता भी ललचाते हैं। जो सुख स्वर्ग में सपने में भी नहीं, वह सारा समाज सिद्धियाँ पल भर में सजा देती हैं। पहले सबको उनकी रुचि के अनुसार सुन्दर सुखद निवास दिए जाते हैं। फिर ऋषि परिवार सहित भरत को आज्ञा देते हैं। मुनिश्रेष्ठ ने तप के बल से ऐसा वैभव रचा जो ब्रह्मा को भी विस्मित कर दे।

214.1

रिधि-सिधि सिर धरि मुनिबर बानी । बड़भागिनि आपुहि अनुमानी ॥
कहहिँ परसपर सिधि समुदाई । अतुलित अतिथि राम लघु भाई ॥

ridhi-sidhi sira dhari munibara bānī | bar̤abhāgini āpuhi anumānī ||
kahahim̐ parasapara sidhi samudāī | atulita atithi rāma laghu bhāī ||

214.2

मुनि-पद बन्दि करिय सोइ आजू । होइ सुखी सब राज-समाजू ॥
अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना । जो बिलोकि बिलखाहिँ विमाना ॥

muni-pada bandi kariya soi ājū | hoi sukhī saba rāja-samājū ||
asa kahi raceu rucira gṛha nānā | jo biloki bilakhāhim̐ vimānā ||

214.3

भोग-बिभूति भूरि भरि राखे । देखत जिन्हहिॅ अमर अभिलाखे ॥
दासीं दास साज सब लीन्हें । जोगवत रहहिँ मनहिॅ मन दीन्हें ॥

bhoga-bibhūti bhūri bhari rākhe | dekhata jinhahiॅ amara abhilākhe ||
dāsīṃ dāsa sāja saba līnheṃ | jogavata rahahim̐ manahiॅ mana dīnheṃ ||

214.4

सब समाज सजि सिधि पल माहीॅ । जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीँ ॥
प्रथमहिँ बास दिये सब केही । सुन्दर सुखद जथा रुचि जेही ॥

saba samāja saji sidhi pala māhīॅ | je sukha surapura sapanehum̐ nāhīm̐ ||
prathamahim̐ bāsa diye saba kehī | sundara sukhada jathā ruci jehī ||

दो॰ 214दोहा

बहुरि सपरिजन भरत कहँ, रिषि अस आयसु दीन्ह ।
विधि-बिसमय-दायक बिभव, मुनिबर तप बल कीन्ह ॥

bahuri saparijana bharata kaham̐, riṣi asa āyasu dīnha |
vidhi-bisamaya-dāyaka bibhava, munibara tapa bala kīnha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0