अयोध्याकाण्ड

अध्याय 213: मुनि भरत के सत्कार की आज्ञा देते हैं

5 श्लोक · 213 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

मुनि भरत के सत्कार की आज्ञा देते हैं

मुनि के वचन सुनकर भरत के मन में सोच होता है कि यह बुरे अवसर पर कठिन संकोच आ पड़ा। फिर गुरु की वाणी को भारी जानकर वे चरणों की वन्दना करके हाथ जोड़कर कहते हैं, आपकी आज्ञा सिर पर रखकर पालन करना ही, नाथ, मेरा परम धर्म है। भरत के वचन मुनि को भाते हैं और वे पवित्र सेवकों और शिष्यों को पास बुलाते हैं। मुनि सोचते हैं कि बड़े अतिथि को न्योता दिया है, पूजा देवता के योग्य होनी चाहिए। यह सुनकर ऋद्धियाँ, सिद्धियाँ और अणिमा आदि आ जाती हैं और कहती हैं, स्वामी, जो आज्ञा हो वह करें। मुनिराज प्रसन्न होकर कहते हैं, राम के विरह में व्याकुल भरत, भाई और समाज सहित, इनकी पहुनाई करके इनका श्रम हरो।

213.1

सुनि मुनि बचन भरत हिय सोचू । भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू ॥
जानि गरुइ गुरु गिरा बहोरी । चरन-बन्दि बोले कर जोरी ॥

suni muni bacana bharata hiya socū | bhayau kuavasara kaṭhina sam̐kocū ||
jāni garui guru girā bahorī | carana-bandi bole kara jorī ||

213.2

सिर धरि आयसु करिय तुम्हारा । परम धरम यह नाथ हमारा ॥
भरत बचन मुनिबर मन भाये । सुचि सेवक सिष निकट बोलाये ॥

sira dhari āyasu kariya tumhārā | parama dharama yaha nātha hamārā ||
bharata bacana munibara mana bhāye | suci sevaka siṣa nikaṭa bolāye ||

213.3

चाहिए कीन्हि भरत पहुनाई । कन्द मूल फल आनहु जाई ॥
भलेहि नाथ कहि तिन्ह सिर नाये । प्रमुदित निज निज काज सिधाये ॥

cāhie kīnhi bharata pahunāī | kanda mūla phala ānahu jāī ||
bhalehi nātha kahi tinha sira nāye | pramudita nija nija kāja sidhāye ||

213.4

मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता । तसि पूजा चाहिय जस देवता ॥
सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई । आयसु होइ सो करहिँ गोसाई ॥

munihi soca pāhuna bar̤a nevatā | tasi pūjā cāhiya jasa devatā ||
suni ridhi sidhi animādika āī | āyasu hoi so karahim̐ gosāī ||

दो॰ 213दोहा

राम-बिरह व्याकुल भरत, सानुज सहित समाज ।
पहुनाई करि हरहु श्रम, कहा मुदित मुनिराज ॥

rāma-biraha vyākula bharata, sānuja sahita samāja |
pahunāī kari harahu śrama, kahā mudita munirāja ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0