अयोध्याकाण्ड

अध्याय 195: भरत से मिलकर गुह का आनन्द

5 श्लोक · 195 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत से मिलकर गुह का आनन्द

इसमें कोई आश्चर्य नहीं, युगों से यही चला आया है, रघुवीर ने किसे बड़ाई नहीं दी? भरत प्रेम से राम के सखा से मिलकर कुशल मंगल पूछते हैं। उनके मन में संकोच, स्नेह और आनन्द बढ़ता है और वे एकटक भरत को देखते खड़े रहते हैं। फिर धीरज धरकर चरणों की वन्दना करके वे हाथ जोड़कर प्रेम से विनती करते हैं। कुशल के मूल आपके चरण कमल देखकर मैंने तीनों कालों में अपनी कुशल मान ली। अब हे प्रभु, आपके परम अनुग्रह से करोड़ों पीढ़ियों सहित मेरा मंगल है। मेरी करनी और कुल समझकर और प्रभु की महिमा देखकर भी जो रघुवीर के चरण नहीं भजता, वह विधाता से ठगा गया है।

195.1

नहिँ अचरज जुग जुग चलि आई । केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई ॥
राम-नाम महिमा सुर कहहीॅ । सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं ॥

nahim̐ acaraja juga juga cali āī | kehi na dīnhi raghubīra bar̤āī ||
rāma-nāma mahimā sura kahahīॅ | suni suni avadhaloga sukhu lahahīṃ ||

195.2

रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा । पूछी कुसल सुमङ्गल खेमा ॥
देखि भरत कर सील-सनेहू । भा निषाद तेहि समय विदेहू ॥

rāmasakhahi mili bharata sapremā | pūchī kusala sumaṅgala khemā ||
dekhi bharata kara sīla-sanehū | bhā niṣāda tehi samaya videhū ||

195.3

सकुच सनेह मोदु मन बाढ़ा । भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा ॥
धरि धीरज पद बन्दि बहोरी । बिनय सप्रेम करत कर जोरी ॥

sakuca saneha modu mana bār̤hā | bharatahi citavata ekaṭaka ṭhār̤hā ||
dhari dhīraja pada bandi bahorī | binaya saprema karata kara jorī ||

195.4

कुसल-मूल पद-पङ्कज पेखी । मैं तिहुँ-काल कुसल निज लेखी ॥
अब प्रभु परम-अनुग्रह तोरें । सहित कोटि-कुल-मङ्गल मोरें ॥

kusala-mūla pada-paṅkaja pekhī | maiṃ tihum̐-kāla kusala nija lekhī ||
aba prabhu parama-anugraha toreṃ | sahita koṭi-kula-maṅgala moreṃ ||

दो॰ 195दोहा

समुझि मोरि करतूति कुल, प्रभु महिमा जियँ जोइ ।
जो न भजइ रघुबीर-पद, जग बिधि बञ्चित सोइ ॥

samujhi mori karatūti kula, prabhu mahimā jiyam̐ joi |
jo na bhajai raghubīra-pada, jaga bidhi bañcita soi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0