अयोध्याकाण्ड

अध्याय 191: निषाद वीर युद्ध के लिए सजते हैं

5 श्लोक · 191 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

निषाद वीर युद्ध के लिए सजते हैं

गुह कहते हैं, भाइयो, जल्दी करो और हथियार सजाओ। सब हर्ष से कहते हैं, बहुत अच्छा, नाथ, और एक दूसरे का जोश बढ़ाते हैं। निषाद प्रणाम कर करके चलते हैं, सब शूर हैं और सबको रण भाता है। राम के चरण कमलों की पादुकाओं का स्मरण कर वे भाथे बाँधते हैं और धनुष चढ़ाते हैं। कवच पहनकर सिर पर टोप रखते हैं और फरसे, बाँस और भाले सीधे करते हैं। कोई ढाल तलवार में इतने कुशल हैं कि आकाश में ऐसे कूदते हैं मानो धरती छोड़ दी हो। सुभटों को योग्य देखकर गुह सबका नाम ले लेकर सम्मान करते हैं। वे कहते हैं, भाइयो, धोखा मत देना, आज मेरा बड़ा काम है। वीर रोष से कहते हैं, वीर कभी अधीर नहीं होते।

191.1

बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ । सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ ॥
भलेहिं नाथ सब कहहिँ सहरषा । एकहिं एक बढ़ावइ करषा ॥

begahu bhāihu sajahu sam̐joū | suni rajāi kadarāi na koū ||
bhalehiṃ nātha saba kahahim̐ saharaṣā | ekahiṃ eka bar̤hāvai karaṣā ||

191.2

चले निषाद जोहारि जोहारी । सूर सकल रन रूचइ रारी ॥
सुमिरि राम-पद-पङ्कज-पनहीं । भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं ॥

cale niṣāda johāri johārī | sūra sakala rana rūcai rārī ||
sumiri rāma-pada-paṅkaja-panahīṃ | bhāthīṃ bām̐dhi car̤hāinhi dhanahīṃ ||

191.3

अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं । फरसा बाँस सेल सम करहीं ॥
एक कुसल अति ओड़न खांड़े । कूदहिँ गगन मनहुँ छिति छाँड़े ॥

am̐garī pahiri kūm̐r̤i sira dharahīṃ | pharasā bām̐sa sela sama karahīṃ ||
eka kusala ati or̤ana khāṃr̤e | kūdahim̐ gagana manahum̐ chiti chām̐r̤e ||

191.4

निज निज साज समाज बनाई । गुह राउतहिं जोहारे जाई ॥
देखि सुभट सब लायक जाने । लै लै नाम सकल सनमाने ॥

nija nija sāja samāja banāī | guha rāutahiṃ johāre jāī ||
dekhi subhaṭa saba lāyaka jāne | lai lai nāma sakala sanamāne ||

दो॰ 191दोहा

भाइहु लावहु धोख जनि, आजु काज बड़ मोहि ।
सुनि सरोष बोले सुभट, बीर अधीर न होहि ॥

bhāihu lāvahu dhokha jani, āju kāja bar̤a mohi |
suni saroṣa bole subhaṭa, bīra adhīra na hohi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0