अयोध्याकाण्ड

अध्याय 185: अयोध्या का हर्ष और चलने की तैयारी

5 श्लोक · 185 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

अयोध्या का हर्ष और चलने की तैयारी

सबके मन में थोड़ा नहीं, बहुत आनन्द होता है, जैसे बादल का गर्जन सुनकर पपीहे और मोर प्रसन्न होते हैं। प्रातःकाल चलने का सुन्दर निर्णय देखकर भरत सबके प्राणप्रिय हो गए। मुनि की वन्दना करके और भरत को सिर नवाकर सब विदा लेकर घर चले, भरत के शील और स्नेह की सराहना करते हुए कि संसार में भरत का जीवन धन्य है। जिसे घर की रखवाली के लिए रखा जाता है, वह मानो अपनी गर्दन कटी समझता है। कोई कहता है, किसी को रहने को मत कहो, जगत में जीवन का लाभ कौन नहीं चाहता? वह सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता, पिता और भाई जल जाएँ, जो राम के चरणों के सम्मुख होने में सहज सहायता न करें।

185.1

भा सब कें मन मोदु न थोरा । जनु घन धुनि सुनि चातक-मोरा ॥
चलत प्रात लखि निरनउ नीके । भरत प्रान-प्रिय भे सबही के ॥

bhā saba keṃ mana modu na thorā | janu ghana dhuni suni cātaka-morā ||
calata prāta lakhi niranau nīke | bharata prāna-priya bhe sabahī ke ||

185.2

मुनिहिँ बन्दि भरतहि सिर नाई । चले सकल घर बिदा कराई ॥
धन्य भरत जीवन जग माहीं । सील सनेह सराहत जाहीं ॥

munihim̐ bandi bharatahi sira nāī | cale sakala ghara bidā karāī ||
dhanya bharata jīvana jaga māhīṃ | sīla saneha sarāhata jāhīṃ ||

185.3

कहहिँ परसपर भा बड़ काजू । सकल चलइ कर साजहिँ साजू ॥
जेहि राखहिँ, रहु घर रखवारी । सो जानइ जनु गरदनि मारी ॥

kahahim̐ parasapara bhā bar̤a kājū | sakala calai kara sājahim̐ sājū ||
jehi rākhahim̐, rahu ghara rakhavārī | so jānai janu garadani mārī ||

185.4

कोउ कह रहन कहिय जनि काहू । को न चहइ जग जीवन-लाहू ॥

kou kaha rahana kahiya jani kāhū | ko na cahai jaga jīvana-lāhū ||

दो॰ 185दोहा

जरउ सो सम्पति सदन सुख, सुहृद मातु पितु भाइ ।
सनमुख होत जो राम पद, करइ न सहज सहाइ ॥

jarau so sampati sadana sukha, suhṛda mātu pitu bhāi |
sanamukha hota jo rāma pada, karai na sahaja sahāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0