सबके मन में थोड़ा नहीं, बहुत आनन्द होता है, जैसे बादल का गर्जन सुनकर पपीहे और मोर प्रसन्न होते हैं। प्रातःकाल चलने का सुन्दर निर्णय देखकर भरत सबके प्राणप्रिय हो गए। मुनि की वन्दना करके और भरत को सिर नवाकर सब विदा लेकर घर चले, भरत के शील और स्नेह की सराहना करते हुए कि संसार में भरत का जीवन धन्य है। जिसे घर की रखवाली के लिए रखा जाता है, वह मानो अपनी गर्दन कटी समझता है। कोई कहता है, किसी को रहने को मत कहो, जगत में जीवन का लाभ कौन नहीं चाहता? वह सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता, पिता और भाई जल जाएँ, जो राम के चरणों के सम्मुख होने में सहज सहायता न करें।