अयोध्याकाण्ड

अध्याय 177: भरत का विनम्र उत्तर आरम्भ

5 श्लोक · 177 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत का विनम्र उत्तर आरम्भ

भरत कहते हैं, गुरु ने मुझे अच्छा उपदेश दिया है, प्रजा और मंत्रियों का भी यही मत है। माता ने भी उचित आज्ञा दी है, मैं उसे सिर पर रखना चाहता हूँ। गुरु, पिता, माता और स्वामी की हितकारी वाणी प्रसन्न मन से माननी चाहिए, उसमें उचित अनुचित का विचार करने से धर्म जाता है और सिर पर पाप चढ़ता है। यह मैं भली भाँति समझता हूँ, फिर भी मन को संतोष नहीं होता। मेरी विनती सुनिए और मेरी दशा देखकर सीख दीजिए। उत्तर देने का अपराध क्षमा करें, साधु दुःखी के दोष नहीं गिनते। पिता स्वर्ग में हैं, सीता और राम वन में, और आप मुझे राज करने को कहते हैं। इसमें मेरा हित है या आपका कोई बड़ा काम?

177.1

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका । प्रजा सचिव सम्मत सबही का ॥
मातु उचित धरि आयसु दीन्हा । अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा ॥

mohi upadesu dīnha gura nīkā | prajā saciva sammata sabahī kā ||
mātu ucita dhari āyasu dīnhā | avasi sīsa dhari cāhaum̐ kīnhā ||

177.2

गुरु-पितु-मातु-स्वामि हित बानी । सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी ॥
उचित कि अनुचित किये बिचारू । धरम जाइ सिर पातक-भारू ॥

guru-pitu-mātu-svāmi hita bānī | suni mana mudita karia bhali jānī ||
ucita ki anucita kiye bicārū | dharama jāi sira pātaka-bhārū ||

177.3

तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई । जो आचरत मोर भल होई ॥
जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें । तदपि होत परितोष न जी कें ॥

tumha tau dehu sarala sikha soī | jo ācarata mora bhala hoī ||
jadyapi yaha samujhata haum̐ nīkeṃ | tadapi hota paritoṣa na jī keṃ ||

177.4

अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू । मोहि अनुहरत सिखावन देहू ॥
ऊतरु देउँ छमब अपराधू । दुखित दोष-गुन गनहिँ न साधू ॥

aba tumha binaya mori suni lehū | mohi anuharata sikhāvana dehū ||
ūtaru deum̐ chamaba aparādhū | dukhita doṣa-guna ganahim̐ na sādhū ||

दो॰ 177दोहा

पितु सुरपुर सिय-राम बन, करन कहहु मोहि राज ।
एहि तेँ जानहु मोर हित, कै आपन बड़ काज ॥

pitu surapura siya-rāma bana, karana kahahu mohi rāja |
ehi tem̐ jānahu mora hita, kai āpana bar̤a kāja ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0