अयोध्याकाण्ड

अध्याय 176: कौसल्या का आग्रह, भरत का व्याकुल हृदय

6 श्लोक · 176 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

कौसल्या का आग्रह, भरत का व्याकुल हृदय

कौसल्या धीरज धरकर कहती हैं, बेटा, गुरु की आज्ञा पथ्य है, उसका आदर करो और विषाद छोड़ो। रघुनाथ वन में हैं और राजा स्वर्ग में, तुम ऐसे कातर होगे तो कैसे चलेगा? परिवार, प्रजा, मंत्री और माताएँ, सबका सहारा तुम्हीं हो। धीरज धरो, गुरु की आज्ञा मानो और पुरवासियों का दुःख हरो। गुरु के वचन और मंत्रियों का समर्थन भरत के हृदय को चन्दन सा लगता है। पर माता की स्नेह भरी कोमल वाणी सुनकर वे व्याकुल हो उठते हैं, कमल नेत्रों के आँसू हृदय में विरह के नए अंकुर सींचते हैं। यह दशा देखकर सब देह की सुध भूल जाते हैं। तुलसीदास उन्हें सहज स्नेह की सीमा कहते हैं। तब धीरधुरंधर भरत हाथ जोड़कर सबको उचित उत्तर देते हैं।

176.1

कौसल्या धरि धीरज कहई । पूत पथ्य गुरु आयसु अहई ॥
सो आदरिअ करिअ हित मानी । तजिअ बिषाद काल-गति जानी ॥

kausalyā dhari dhīraja kahaī | pūta pathya guru āyasu ahaī ||
so ādaria karia hita mānī | tajia biṣāda kāla-gati jānī ||

176.2

बन-रघुपति सुरपुर-नरनाहू । तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू ॥
परिजन प्रजा सचिव सब अम्बा । तुम्हहीं सुत सब कहँ अवलम्बा ॥

bana-raghupati surapura-naranāhū | tumha ehi bhām̐ti tāta kadarāhū ||
parijana prajā saciva saba ambā | tumhahīṃ suta saba kaham̐ avalambā ||

176.3

लखि विधि बाम काल कठिनाई । धीरज धरहु मातु बलि जाई ॥
सिर धरि गुरु आयसु अनुसरहू । प्रजा पालि पुरजन दुख हरहू ॥

lakhi vidhi bāma kāla kaṭhināī | dhīraja dharahu mātu bali jāī ||
sira dhari guru āyasu anusarahū | prajā pāli purajana dukha harahū ||

176.4

गुरु के बचन सचिव अभिनन्दन । सुने भरत हिय हित जनु चन्दन ॥
सुनी बहोरि मातु मृदु बानी । सील सनेह सरल रस सानी ॥

guru ke bacana saciva abhinandana | sune bharata hiya hita janu candana ||
sunī bahori mātu mṛdu bānī | sīla saneha sarala rasa sānī ||

176.छं॰ 1छन्द

सानी सरल रस मातु, बानी, सुनि भरत ब्याकुल भये ।
लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत, बिरह उर अङ्कुर नये ॥
से दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की ।
तुलसी सराहत सकल सादर, सीवँ सहज सनेह की ॥

sānī sarala rasa mātu, bānī, suni bharata byākula bhaye |
locana saroruha stravata sīṃcata, biraha ura aṅkura naye ||
se dasā dekhata samaya tehi bisarī sabahi sudhi deha kī |
tulasī sarāhata sakala sādara, sīvam̐ sahaja saneha kī ||

176.सो॰ 176सोरठा

भरतु कमल कर जोरि, धीर-धुरन्धर धीर धरि ।
बचन अमिय जनु बोरि, देत उचित उत्तर सबहि ॥

bharatu kamala kara jori, dhīra-dhurandhara dhīra dhari |
bacana amiya janu bori, deta ucita uttara sabahi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0