पितु-हित भरत कीन्हि जसि करनी । सो मुख लाख जाइ नहिँ बरनी ॥
सुदिन सोधि मुनिबर तब आये । सचिव महाजन सकल बोलाये ॥
pitu-hita bharata kīnhi jasi karanī | so mukha lākha jāi nahim̐ baranī ||
sudina sodhi munibara taba āye | saciva mahājana sakala bolāye ||
5 श्लोक · 171 में से 326
पिता के हित के लिए भरत ने जो किया, वह लाखों मुखों से भी नहीं कहा जा सकता। शुभ दिन देखकर वसिष्ठ मंत्रियों और महाजनों को राजसभा में बुलाते हैं और दोनों भाइयों को बुला भेजते हैं। भरत को पास बिठाकर वे नीति और धर्म के वचन कहते हैं। पहले सारी कथा कहते हैं कि कुटिल कैकेयी ने कैसी करनी की, फिर राजा के सत्य व्रत की सराहना करते हैं, जिन्होंने देह छोड़कर प्रेम निभाया। श्रीराम के गुण और स्वभाव कहते हुए मुनि के नेत्र भर आते हैं और शरीर पुलकित हो जाता है। लक्ष्मण और सीता की प्रीति कहते हुए वे शोक में डूब जाते हैं। वे बिलखकर कहते हैं, भरत, होनी प्रबल है। हानि लाभ, जीवन मरण, यश अपयश विधाता के हाथ हैं।
पितु-हित भरत कीन्हि जसि करनी । सो मुख लाख जाइ नहिँ बरनी ॥
सुदिन सोधि मुनिबर तब आये । सचिव महाजन सकल बोलाये ॥
pitu-hita bharata kīnhi jasi karanī | so mukha lākha jāi nahim̐ baranī ||
sudina sodhi munibara taba āye | saciva mahājana sakala bolāye ||
बैठे राजसभाँ सब जाई । पठये, बोलि भरत दोउ भाई ॥
भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे । नीति-धरम-मय बचन उचारे ॥
baiṭhe rājasabhām̐ saba jāī | paṭhaye, boli bharata dou bhāī ||
bharatu basiṣṭha nikaṭa baiṭhāre | nīti-dharama-maya bacana ucāre ||
प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी । कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी ॥
भूप धरम-व्रत सत्य सराहा । जेहिं तनु परिहरि प्रेम निबाहा ॥
prathama kathā saba munibara baranī | kaikai kuṭila kīnhi jasi karanī ||
bhūpa dharama-vrata satya sarāhā | jehiṃ tanu parihari prema nibāhā ||
कहत राम-गुन-सील-सुभाऊ । सजल-नयन पुलकेउ मुनिराऊ ॥
बहुरि लखन-सिय प्रीति बखानी । सोक सनेह मगन मुनि-ज्ञानी ॥
kahata rāma-guna-sīla-subhāū | sajala-nayana pulakeu munirāū ||
bahuri lakhana-siya prīti bakhānī | soka saneha magana muni-jñānī ||
सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ ।
हानि लाभु जीवन मरन, जस अपजस विधि हाथ ॥
sunahu bharata bhāvī prabala, bilakhi kaheu muninātha |
hāni lābhu jīvana marana, jasa apajasa vidhi hātha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0