अयोध्याकाण्ड

अध्याय 169: आँसुओं की रात और वसिष्ठ का उपदेश

5 श्लोक · 169 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

आँसुओं की रात और वसिष्ठ का उपदेश

कौसल्या कहती हैं, राम तुम्हें प्राणों से भी प्रिय हैं और तुम उन्हें प्राणों से भी प्यारे हो। चन्द्रमा भले विष टपकाए, पाला आग बरसाए, मछली जल से विरक्त हो जाए, ज्ञान होने पर भी मोह न मिटे, पर तुम राम के विरुद्ध नहीं हो सकते। जो इसे तुम्हारा मत कहे, वह सपने में भी सुख न पाए। यह कहकर माता भरत को हृदय से लगाती हैं, उनके स्तनों से दूध बहता है और आँखें भर आती हैं। विलाप करते करते सारी रात बीत जाती है। तब वामदेव और वसिष्ठ आकर मंत्रियों और महाजनों को बुलाते हैं। मुनि भरत को परमार्थ का उपदेश देकर कहते हैं, धीरज धरो और जो अवसर है वह करो। गुरु के वचन सुनकर भरत उठते हैं और सब तैयारी कराते हैं।

169.1

राम प्रानहु तँ प्रान तुम्हारे । तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तेँ प्यारे ॥
बिधु विष चवै स्त्रवै हिम आगी । होइ बारिचर बारि बिरागी ॥

rāma prānahu tam̐ prāna tumhāre | tumha raghupatihi prānahu tem̐ pyāre ||
bidhu viṣa cavai stravai hima āgī | hoi bāricara bāri birāgī ||

169.2

भये ज्ञान बरु मिटइ न मोहू । तुम्ह रामहिँ प्रतिकूल न होहू ॥
मत तुम्हार यह जो जग कहहीँ । सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं ॥

bhaye jñāna baru miṭai na mohū | tumha rāmahim̐ pratikūla na hohū ||
mata tumhāra yaha jo jaga kahahīm̐ | so sapanehum̐ sukha sugati na lahahīṃ ||

169.3

अस कहि मातु भरत हियँ लाये । थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाये ॥
करत बिलाप बहुत यहि भाँती । बैठेहिं बीति गई सब राती ॥

asa kahi mātu bharata hiyam̐ lāye | thana paya stravahiṃ nayana jala chāye ||
karata bilāpa bahuta yahi bhām̐tī | baiṭhehiṃ bīti gaī saba rātī ||

169.4

बामदेउ बसिष्ठ तब आये । सचिव महाजन सकल बोलाये ॥
मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे । कहि परमारथ बचन सुदेसे ॥

bāmadeu basiṣṭha taba āye | saciva mahājana sakala bolāye ||
muni bahu bhām̐ti bharata upadese | kahi paramāratha bacana sudese ||

दो॰ 169दोहा

तात हृदयँ धीरज धरहु, करहु जो अवसर आज ।
उठे भरत गुरु बचन सुनि, करन कहेउ सब साज ॥

tāta hṛdayam̐ dhīraja dharahu, karahu jo avasara āja |
uṭhe bharata guru bacana suni, karana kaheu saba sāja ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0