कौसल्या कहती हैं, राम तुम्हें प्राणों से भी प्रिय हैं और तुम उन्हें प्राणों से भी प्यारे हो। चन्द्रमा भले विष टपकाए, पाला आग बरसाए, मछली जल से विरक्त हो जाए, ज्ञान होने पर भी मोह न मिटे, पर तुम राम के विरुद्ध नहीं हो सकते। जो इसे तुम्हारा मत कहे, वह सपने में भी सुख न पाए। यह कहकर माता भरत को हृदय से लगाती हैं, उनके स्तनों से दूध बहता है और आँखें भर आती हैं। विलाप करते करते सारी रात बीत जाती है। तब वामदेव और वसिष्ठ आकर मंत्रियों और महाजनों को बुलाते हैं। मुनि भरत को परमार्थ का उपदेश देकर कहते हैं, धीरज धरो और जो अवसर है वह करो। गुरु के वचन सुनकर भरत उठते हैं और सब तैयारी कराते हैं।