बेचहिँ बेद धरम दुहि लेहीं । पिसुन पराय पाप कहि देहीं ॥
कपटी कुटिल कलह-प्रिय क्रोधी । बेद-विदूषक बिस्व-बिरोधी ॥
becahim̐ beda dharama duhi lehīṃ | pisuna parāya pāpa kahi dehīṃ ||
kapaṭī kuṭila kalaha-priya krodhī | beda-vidūṣaka bisva-birodhī ||
5 श्लोक · 168 में से 326
शपथ आगे चलती है। जो वेद बेचते हैं, धर्म को दुहकर स्वार्थ साधते हैं, दूसरों के पाप कहते फिरते हैं, जो कपटी और कलहप्रिय होकर वेद की निन्दा करते हैं, जो लोभी पराए धन और पराई स्त्री पर दृष्टि रखते हैं, यदि मेरी सम्मति हो तो मुझे उनकी घोर गति मिले। जिन्हें संतों का संग नहीं भाता, जो मनुष्य देह पाकर भी हरि को नहीं भजते, जिन्हें हरि और हर का यश नहीं सुहाता, जो वेद मार्ग छोड़कर वेष बनाकर जगत को ठगते हैं, शंकर मुझे उनकी गति दें, माँ, यदि मैं यह भेद जानता होऊँ। भरत के सच्चे सरल वचन सुनकर माता कहती हैं, बेटा, तुम मन, वचन और कर्म से सदा राम के प्रिय हो।
बेचहिँ बेद धरम दुहि लेहीं । पिसुन पराय पाप कहि देहीं ॥
कपटी कुटिल कलह-प्रिय क्रोधी । बेद-विदूषक बिस्व-बिरोधी ॥
becahim̐ beda dharama duhi lehīṃ | pisuna parāya pāpa kahi dehīṃ ||
kapaṭī kuṭila kalaha-priya krodhī | beda-vidūṣaka bisva-birodhī ||
लोभी लम्पट लोलुपचारा । जे ताकहिं परधनु परदारा ॥
पावउँ मैं तिन्ह कै गति घोरा । जौं जननी यह सम्मत मोरा ॥
lobhī lampaṭa lolupacārā | je tākahiṃ paradhanu paradārā ||
pāvaum̐ maiṃ tinha kai gati ghorā | jauṃ jananī yaha sammata morā ||
जे नहिं साधु-सङ्ग अनुरागे । परमारथ-पथ बिमुख अभागे ॥
जे न भजहिँ हरि नर-तनु पाई । जिन्हहिं न हरि-हर-सुजस सुहाई ॥
je nahiṃ sādhu-saṅga anurāge | paramāratha-patha bimukha abhāge ||
je na bhajahim̐ hari nara-tanu pāī | jinhahiṃ na hari-hara-sujasa suhāī ||
तजि खुति-पन्थ बाम-पथ चलहीं । बञ्चक बिरचि बेष जग छलहीं ॥
तिन्ह कइ गति मोहि सङ्कर देऊ । जननी जी यह जानउँ भेऊ ॥
taji khuti-pantha bāma-patha calahīṃ | bañcaka biraci beṣa jaga chalahīṃ ||
tinha kai gati mohi saṅkara deū | jananī jī yaha jānaum̐ bheū ||
मातु भरत के बचन सुनि, साँचे सरल सुभायँ ।
कहति राम-प्रिय तात तुम्ह, सदा बचन मन कायँ ॥
mātu bharata ke bacana suni, sām̐ce sarala subhāyam̐ |
kahati rāma-priya tāta tumha, sadā bacana mana kāyam̐ ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0