अयोध्याकाण्ड

अध्याय 167: भरत की शपथ, इसमें मेरी सम्मति नहीं

5 श्लोक · 167 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत की शपथ, इसमें मेरी सम्मति नहीं

कौसल्या बिलखते भाइयों को हृदय से लगाकर विवेक भरे वचनों से भरत को समझाती हैं, और भरत भी पुराण और वेद की कथाएँ कहकर माताओं को धीरज देते हैं। फिर हाथ जोड़कर, छलरहित सरल वाणी में वे कठोर शपथ लेते हैं। माता, पिता या पुत्र को मारने वाले, गोशाला और ब्राह्मणों का गाँव जलाने वाले, स्त्री और बालक का वध करने वाले, मित्र और राजा को विष देने वाले को जो पाप लगता है, कर्म, वचन और मन के जितने पाप और उपपाप हैं, वे सब मुझे लगें, माँ, यदि इसमें मेरी सम्मति हो। जो हरि और हर के चरण छोड़कर भयानक भूतगणों को भजते हैं, विधाता मुझे उनकी गति दे।

167.1

बिलपहिं बिकल भरत बिकल भाई । कौसल्याँ लिये हृदयँ लगाई ॥
भाँति अनेक भरत समुझाये । कहि बिबेक-मय बचन सुहाये ॥

bilapahiṃ bikala bharata bikala bhāī | kausalyām̐ liye hṛdayam̐ lagāī ||
bhām̐ti aneka bharata samujhāye | kahi bibeka-maya bacana suhāye ||

167.2

भरतहुँ मातु सकल समुझाईं । कहि पुरान-श्रुति कथा सुहाईं ॥
छल बिहीन सुचि सरल सुबानी । बोले भरत जोरि जुग पानी ॥

bharatahum̐ mātu sakala samujhāīṃ | kahi purāna-śruti kathā suhāīṃ ||
chala bihīna suci sarala subānī | bole bharata jori juga pānī ||

167.3

जे अघ मातु-पिता-सुत मारें । गाइ गोठ महिसुर-पुर जारें ॥
जे अघ तिय-बालक-बध कीन्हें । मीत महीपति माहुर दीन्हें ॥

je agha mātu-pitā-suta māreṃ | gāi goṭha mahisura-pura jāreṃ ||
je agha tiya-bālaka-badha kīnheṃ | mīta mahīpati māhura dīnheṃ ||

167.4

जे पातक उपपातक अहहीं । करम बचन मन भव कबि कहहीं ॥
ते पातक मोहि होहु बिधाता । जौँ यह होइ मोर मत माता ॥

je pātaka upapātaka ahahīṃ | karama bacana mana bhava kabi kahahīṃ ||
te pātaka mohi hohu bidhātā | jaum̐ yaha hoi mora mata mātā ||

दो॰ 167दोहा

जे परिहरि हरि-हर-चरन, भजहिं भूतगन घोर ।
तिन्ह कइ गति मोहि देउ बिधि, जौँ जननी मत मोर ॥

je parihari hari-hara-carana, bhajahiṃ bhūtagana ghora |
tinha kai gati mohi deu bidhi, jaum̐ jananī mata mora ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0