कौसल्या आगे कहती हैं, श्रीराम का मुख प्रसन्न था, मन में न कोई रंग था न रोष। सबको संतोष देकर वे वन को चले। सीता भी साथ हो लीं, राम के चरणों की अनुरागिनी पीछे कैसे रहतीं। लक्ष्मण भी उठकर चल दिए, श्रीराम के बहुत समझाने पर भी न रुके। रघुनाथ सबको सिर नवाकर चले गए। यह सब इन आँखों के सामने हुआ, फिर भी मैं साथ न गई और प्राण भी पीछे न भेजे। राम जैसे पुत्र की माता होकर भी मुझे लाज नहीं आती। राजा ने जीना और मरना दोनों भली भाँति जाना, पर मेरा हृदय सौ वज्रों जैसा कठोर है। ये वचन सुनकर भरत सहित सारा रनिवास बिलखने लगता है, मानो राजमहल शोक का निवास हो।