अयोध्याकाण्ड

अध्याय 166: कौसल्या बताती हैं, तीनों कैसे वन गए

5 श्लोक · 166 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

कौसल्या बताती हैं, तीनों कैसे वन गए

कौसल्या आगे कहती हैं, श्रीराम का मुख प्रसन्न था, मन में न कोई रंग था न रोष। सबको संतोष देकर वे वन को चले। सीता भी साथ हो लीं, राम के चरणों की अनुरागिनी पीछे कैसे रहतीं। लक्ष्मण भी उठकर चल दिए, श्रीराम के बहुत समझाने पर भी न रुके। रघुनाथ सबको सिर नवाकर चले गए। यह सब इन आँखों के सामने हुआ, फिर भी मैं साथ न गई और प्राण भी पीछे न भेजे। राम जैसे पुत्र की माता होकर भी मुझे लाज नहीं आती। राजा ने जीना और मरना दोनों भली भाँति जाना, पर मेरा हृदय सौ वज्रों जैसा कठोर है। ये वचन सुनकर भरत सहित सारा रनिवास बिलखने लगता है, मानो राजमहल शोक का निवास हो।

166.1

मुख प्रसन्न मन रङ्ग न रोषू । सब कर सब विधि करि परितोषू ॥
चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी । रहइ न राम-चरन-अनुरागी ॥

mukha prasanna mana raṅga na roṣū | saba kara saba vidhi kari paritoṣū ||
cale bipina suni siya sam̐ga lāgī | rahai na rāma-carana-anurāgī ||

166.2

सुनतहिं लखन चले उठि साथा । रहहिँ न जतन किये रघुनाथा ॥
तब रघुपति सबही सिर नाई । चले सङ्ग सिय अरु लघु भाई ॥

sunatahiṃ lakhana cale uṭhi sāthā | rahahim̐ na jatana kiye raghunāthā ||
taba raghupati sabahī sira nāī | cale saṅga siya aru laghu bhāī ||

166.3

राम-लखन-सिय बनहिँ सिधाये । गइउँ न सङ्ग न प्रान पठाये ॥
यह सब भा इन्ह आँखिन्ह आगें । तउ न तजा तनु जीव अभागें ॥

rāma-lakhana-siya banahim̐ sidhāye | gaium̐ na saṅga na prāna paṭhāye ||
yaha saba bhā inha ām̐khinha āgeṃ | tau na tajā tanu jīva abhāgeṃ ||

166.4

मोहि न लाज निज नेह निहारी । राम-सरिस-सुत मैं महतारी ॥
जिऐ मरै भल भूपति जाना । मोर हृदय सत-कुलिस-समाना ॥

mohi na lāja nija neha nihārī | rāma-sarisa-suta maiṃ mahatārī ||
jiai marai bhala bhūpati jānā | mora hṛdaya sata-kulisa-samānā ||

दो॰ 166दोहा

कौसल्या के बचन सुनि, भरत सहित रनिवास ।
ब्याकुल बिलपत राजगृह, मानहुँ सोक-नेवासु ॥

kausalyā ke bacana suni, bharata sahita ranivāsa |
byākula bilapata rājagṛha, mānahum̐ soka-nevāsu ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0