अयोध्याकाण्ड

अध्याय 163: शत्रुघ्न ने मन्थरा को दण्ड दिया, भरत ने छुड़ाया

5 श्लोक · 163 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

शत्रुघ्न ने मन्थरा को दण्ड दिया, भरत ने छुड़ाया

माता की कुटिलता सुनकर शत्रुघ्न का शरीर क्रोध से जलने लगा, पर कुछ वश नहीं चलता। उसी समय मन्थरा वस्त्र आभूषण सजाकर आई। उसे देखकर लक्ष्मण के छोटे भाई ऐसे क्रोध से भर गए मानो जलती आग में घी की आहुति पड़ी हो। उन्होंने उछलकर कूबड़ पर लात मारी; वह चिल्लाती हुई मुँह के बल गिरी। कूबड़ टूटा, सिर फूटा और मुँह से खून बहने लगा। वह बोली, हाय दैव, भला करके बुरा फल पाया। उसे नख से शिख तक दुष्ट देखकर शत्रुघ्न उसकी चोटी पकड़ पकड़कर घसीटने लगे। दयानिधि भरत ने उसे छुड़ा दिया और दोनों भाई कौसल्या के पास गए। दोहे में मलिन वस्त्र, विवर्ण, व्याकुल और दुःख से दुबली कौसल्या ऐसी लगती हैं मानो सोने की सुन्दर कल्पलता को पाला मार गया हो।

163.1

सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई । जरहिँ गात रिस कछु न बसाई ॥
तेहि अवसर कुबरी तहँ आई । बसन बिभूषन विविध बनाई ॥

suni satrughuna mātu kuṭilāī | jarahim̐ gāta risa kachu na basāī ||
tehi avasara kubarī taham̐ āī | basana bibhūṣana vividha banāī ||

163.2

लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई । बरत अनल घृत आहुति पाई ॥
हुमगि लात तकि कूबर मारा । परि मुह भरि महि करत पुकारा ॥

lakhi risa bhareu lakhana laghu bhāī | barata anala ghṛta āhuti pāī ||
humagi lāta taki kūbara mārā | pari muha bhari mahi karata pukārā ||

163.3

कूबर टूटेउ फूट कपारू । दलित-दसन मुख रुधिर-प्रचारू ॥
आह दइअ मैं काह नसावा । करत नीक फल अनइस पावा ॥

kūbara ṭūṭeu phūṭa kapārū | dalita-dasana mukha rudhira-pracārū ||
āha daia maiṃ kāha nasāvā | karata nīka phala anaisa pāvā ||

163.4

सुनि रिपुहन लखि नख-सिख खोटी । लगे घसीटन धरि धरि झोंटी ॥
भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई । कौसल्या पहिँ गे दोउ भाई ॥

suni ripuhana lakhi nakha-sikha khoṭī | lage ghasīṭana dhari dhari jhoṃṭī ||
bharata dayānidhi dīnhi char̤āī | kausalyā pahim̐ ge dou bhāī ||

दो॰ 163दोहा

मलिन-बसन बिबरन बिकल, कृस सरीर दुख भार ।
कनक कलप बर बेलि बन, मानहुँ हनी तुसार ॥

malina-basana bibarana bikala, kṛsa sarīra dukha bhāra |
kanaka kalapa bara beli bana, mānahum̐ hanī tusāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0