भरत आगे कहते हैं, जब तेरे मन में यह कुमति ठनी, तब हृदय के टुकड़े टुकड़े क्यों न हो गए? वर माँगते समय जीभ गल न गई? मृत्यु के समय विधाता ने राजा की बुद्धि हर ली। वे कहते हैं, स्त्री के हृदय की गति विधाता भी नहीं जानता, वह कपट, पाप और अवगुणों की खान है; सरल, सुशील, धर्मपरायण राजा उसे कैसे जानते। जगत में ऐसा कौन जीव है जिसे रघुनाथ प्राणों से प्यारे न हों? वही राम तेरे शत्रु हो गए; सच कह, तू कौन है? जो है सो है, मुँह पर कालिख लगाकर आँखों की ओट जाकर बैठ। दोहे में भरत कहते हैं, विधाता ने मुझे राम के विरोधी हृदय से उत्पन्न किया; मेरे समान पापी कौन है, तुझसे कुछ कहना व्यर्थ है।