अयोध्याकाण्ड

अध्याय 162: कैकेयी की करनी पर भरत की वेदना

5 श्लोक · 162 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

कैकेयी की करनी पर भरत की वेदना

भरत आगे कहते हैं, जब तेरे मन में यह कुमति ठनी, तब हृदय के टुकड़े टुकड़े क्यों न हो गए? वर माँगते समय जीभ गल न गई? मृत्यु के समय विधाता ने राजा की बुद्धि हर ली। वे कहते हैं, स्त्री के हृदय की गति विधाता भी नहीं जानता, वह कपट, पाप और अवगुणों की खान है; सरल, सुशील, धर्मपरायण राजा उसे कैसे जानते। जगत में ऐसा कौन जीव है जिसे रघुनाथ प्राणों से प्यारे न हों? वही राम तेरे शत्रु हो गए; सच कह, तू कौन है? जो है सो है, मुँह पर कालिख लगाकर आँखों की ओट जाकर बैठ। दोहे में भरत कहते हैं, विधाता ने मुझे राम के विरोधी हृदय से उत्पन्न किया; मेरे समान पापी कौन है, तुझसे कुछ कहना व्यर्थ है।

162.1

जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ । खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ ॥
बर माँगत मन भइ नहिं पीरा । गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा ॥

jaba taiṃ kumati kumata jiyam̐ ṭhayaū | khaṃḍa khaṃḍa hoi hradau na gayaū ||
bara mām̐gata mana bhai nahiṃ pīrā | gari na jīha muham̐ pareu na kīrā ||

162.2

भूपँ प्रतीति तोरि किमि कीन्ही । मरन काल विधि मति हरि लीन्ही ॥
बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी । सकल कपट-अघ-अवगुन-खानी ॥

bhūpam̐ pratīti tori kimi kīnhī | marana kāla vidhi mati hari līnhī ||
bidhihum̐ na nāri hṛdaya gati jānī | sakala kapaṭa-agha-avaguna-khānī ||

162.3

सरल सुसील धरम-रत राऊ । सो किमि जानइ तीय सुभाऊ ॥
अस को जीव-जन्तु जग माहीं । जेहि रघुनाथ प्रान-प्रिय नाहीं ॥

sarala susīla dharama-rata rāū | so kimi jānai tīya subhāū ||
asa ko jīva-jantu jaga māhīṃ | jehi raghunātha prāna-priya nāhīṃ ||

162.4

भे अति अहित राम तेउ तोही । को तू अहसि सत्य कहु मोही ॥
जो हसि सो हसि मुँह मसि लाई । आँखि ओट उठि बैठहिँ जाई ॥

bhe ati ahita rāma teu tohī | ko tū ahasi satya kahu mohī ||
jo hasi so hasi mum̐ha masi lāī | ām̐khi oṭa uṭhi baiṭhahim̐ jāī ||

दो॰ 162दोहा

राम-बिरोधी-हृदय तें, प्रगट कीन्ह बिधि मोहि ।
मो समान को पातकी, बादि कहउँ कछु तोहि ॥

rāma-birodhī-hṛdaya teṃ, pragaṭa kīnha bidhi mohi |
mo samāna ko pātakī, bādi kahaum̐ kachu tohi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0