अयोध्याकाण्ड

अध्याय 164: कौसल्या के चरणों में भरत का विलाप

5 श्लोक · 164 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

कौसल्या के चरणों में भरत का विलाप

भरत को देखते ही माता कौसल्या उठकर दौड़ती हैं, पर मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़ती हैं। भरत यह देखकर अत्यन्त व्याकुल हो उठते हैं और देह की सुध भूलकर उनके चरणों में गिर जाते हैं। वे पूछते हैं, माँ, पिताजी कहाँ हैं? सीता और दोनों भाई राम लक्ष्मण कहाँ हैं? फिर वे अपने ही जन्म को धिक्कारते हैं। कैकेयी जगत में जन्मी ही क्यों, और जन्मी तो बाँझ क्यों न रही, जिसने कुल के कलंक, अपयश के पात्र और प्रियजनों के द्रोही को जन्म दिया। पिता स्वर्ग गए, श्रीराम वन गए, और इन सब अनर्थों का कारण केवल मैं हूँ, बाँस के वन में लगी आग की तरह। भरत के कोमल वचन सुनकर माता सँभलती हैं, उन्हें उठाकर हृदय से लगा लेती हैं और आँसू बहाती हैं।

164.1

भरतहि देखि मातु उठि धाई । मुरछित अवनि परी झइँ आई ॥
देखत भरत बिकल भये भारी । परे चरन तन दसा बिसारी ॥

bharatahi dekhi mātu uṭhi dhāī | murachita avani parī jhaim̐ āī ||
dekhata bharata bikala bhaye bhārī | pare carana tana dasā bisārī ||

164.2

मातु तात कहँ देहि देखाई । कहँ सिय-राम-लखन दोउ भाई ॥
कैकइ कत जनमी जग माँगा । जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा ॥

mātu tāta kaham̐ dehi dekhāī | kaham̐ siya-rāma-lakhana dou bhāī ||
kaikai kata janamī jaga mām̐gā | jauṃ janami ta bhai kāhe na bām̐jhā ||

164.3

कुल-कलङ्क जेहिं जनमेउ मोही । अपजस-भाजन प्रिय-जन-द्रोही ॥
को तिभुवन मोहि सरिस अभागी । गति असि तोरि मातु जेहि लागी ॥

kula-kalaṅka jehiṃ janameu mohī | apajasa-bhājana priya-jana-drohī ||
ko tibhuvana mohi sarisa abhāgī | gati asi tori mātu jehi lāgī ||

164.4

पितु सुरपुर बन रघुबर-केतू । मैं केवल सब अनरथ हेतु ॥
धिग मोहि भयउँ बेनु-बन-आगी । दुसह दाह दुख दूषन भागी ॥

pitu surapura bana raghubara-ketū | maiṃ kevala saba anaratha hetu ||
dhiga mohi bhayaum̐ benu-bana-āgī | dusaha dāha dukha dūṣana bhāgī ||

दो॰ 164दोहा

मातु भरत के बचन मृदु, सुनि पुनि उठी सँभारि ।
लिये उठाइ लगाइ उर, लोचन मोचति बारि ॥

mātu bharata ke bacana mṛdu, suni puni uṭhī sam̐bhāri |
liye uṭhāi lagāi ura, locana mocati bāri ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0