अयोध्याकाण्ड

अध्याय 161: भरत की माता को फटकार

5 श्लोक · 161 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत की माता को फटकार

पुत्र को व्याकुल देखकर कैकेयी समझाती है, मानो जले पर नमक लगा रही हो: बेटा, राजा सोच करने योग्य नहीं; उन्होंने पुण्य और यश भोगकर अन्त में इन्द्रलोक पाया। ऐसा विचारकर सोच छोड़ो और समाज सहित नगर का राज करो। यह सुनकर राजकुमार ऐसे सहम गए मानो पके घाव पर अंगारा छू गया हो। लम्बी साँस लेकर वे बोले, पापिनी, तूने सब प्रकार कुल का नाश कर दिया। यदि तेरे मन में ऐसी कुरुचि थी तो जन्म लेते ही मुझे क्यों न मार डाला। तूने पेड़ काटकर पत्ते को सींचा। दोहे में भरत कहते हैं, सूर्यवंश जैसे कुल में दशरथ पिता और राम लक्ष्मण जैसे भाई मिले, पर माता तू मिली; विधाता के आगे कुछ वश नहीं चलता।

161.1

बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति । मनहुँ जरे पर लोनु लगावति ॥
तात राउ नहिँ सोचे-जोगू । बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू ॥

bikala biloki sutahi samujhāvati | manahum̐ jare para lonu lagāvati ||
tāta rāu nahim̐ soce-jogū | bir̤hai sukṛta jasu kīnheu bhogū ||

161.2

जीवत सकल जनम-फल पाये । अन्त अमरपति सदन सिधाये ॥
अस अनुमानि सोच परिहरहू । सहित समाज राज पुर करहू ॥

jīvata sakala janama-phala pāye | anta amarapati sadana sidhāye ||
asa anumāni soca pariharahū | sahita samāja rāja pura karahū ||

161.3

सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू । पाकें छत जनु लाग अँगारू ॥
धीरज धरि भरि लेहिँ उसासा । पापनि सबहि भाँति कुल नासा ॥

suni suṭhi sahameu rājakumārū | pākeṃ chata janu lāga am̐gārū ||
dhīraja dhari bhari lehim̐ usāsā | pāpani sabahi bhām̐ti kula nāsā ||

161.4

जौँ पै कुरुचि रही अति तोही । जनमत काहे न मारे मोही ॥
पेड़ काटि तैं पालउ सींचा । मीन जिअन निति बारि उलीचा ॥

jaum̐ pai kuruci rahī ati tohī | janamata kāhe na māre mohī ||
per̤a kāṭi taiṃ pālau sīṃcā | mīna jiana niti bāri ulīcā ||

दो॰ 161दोहा

हंस-बंस दसरथ-जनक, राम-लखन से भाइ ।
जननी तूँ जननी भई, विधि सन कछु न बसाइ ॥

haṃsa-baṃsa dasaratha-janaka, rāma-lakhana se bhāi |
jananī tūm̐ jananī bhaī, vidhi sana kachu na basāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0