राजा का शरीर तेल से भरी नाव में रखा गया। फिर वसिष्ठ ने दूतों को बुलाकर कहा, शीघ्र दौड़कर भरत के पास जाओ, राजा का समाचार कहीं किसी से न कहना। भरत से जाकर इतना ही कहना कि गुरु ने दोनों भाइयों को बुलाया है। दूत ऐसे वेग से चले कि श्रेष्ठ घोड़े भी लजा गए। इधर जब से अवध में अनर्थ आरम्भ हुआ, तभी से भरत को अपशकुन हो रहे थे। वे रात को भयानक स्वप्न देखते थे। दिन में ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देते, अनेक विधि से शिवजी का अभिषेक करते, और हृदय में महेश को मनाकर माता, पिता, परिजनों और भाइयों की कुशल माँगते। दोहे में भरत यों सोच ही रहे थे कि दूत आ पहुँचे; गुरु की आज्ञा सुनकर वे गणेश को मनाकर चल पड़े।