अयोध्याकाण्ड

अध्याय 157: भरत के पास दूत, अपशकुन

5 श्लोक · 157 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरत के पास दूत, अपशकुन

राजा का शरीर तेल से भरी नाव में रखा गया। फिर वसिष्ठ ने दूतों को बुलाकर कहा, शीघ्र दौड़कर भरत के पास जाओ, राजा का समाचार कहीं किसी से न कहना। भरत से जाकर इतना ही कहना कि गुरु ने दोनों भाइयों को बुलाया है। दूत ऐसे वेग से चले कि श्रेष्ठ घोड़े भी लजा गए। इधर जब से अवध में अनर्थ आरम्भ हुआ, तभी से भरत को अपशकुन हो रहे थे। वे रात को भयानक स्वप्न देखते थे। दिन में ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देते, अनेक विधि से शिवजी का अभिषेक करते, और हृदय में महेश को मनाकर माता, पिता, परिजनों और भाइयों की कुशल माँगते। दोहे में भरत यों सोच ही रहे थे कि दूत आ पहुँचे; गुरु की आज्ञा सुनकर वे गणेश को मनाकर चल पड़े।

157.1

तेल नाव भरि नृप-तनु राखा । दूत बोलाइ बहुरि अस भाखा ॥
धावहु बेगि भरत पहिँ जाहू । नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू ॥

tela nāva bhari nṛpa-tanu rākhā | dūta bolāi bahuri asa bhākhā ||
dhāvahu begi bharata pahim̐ jāhū | nṛpa sudhi katahum̐ kahahu jani kāhū ||

157.2

एतनेइ कहेउ भरत सन जाई । गुरु-बोलाइ पठयउ दोउ भाई ॥
सुनि मुनि आयसु धावन धाये । चले बेगि बर-बाजि लजाये ॥

etanei kaheu bharata sana jāī | guru-bolāi paṭhayau dou bhāī ||
suni muni āyasu dhāvana dhāye | cale begi bara-bāji lajāye ||

157.3

अनरथ अवध अरम्भेउ जब तैं । कुसगुन होहिँ भरत कहँ तब तैं ॥
देखहिँ राति भयानक सपना । जागि करहिँ कटु कोटि कलपना ॥

anaratha avadha arambheu jaba taiṃ | kusaguna hohim̐ bharata kaham̐ taba taiṃ ||
dekhahim̐ rāti bhayānaka sapanā | jāgi karahim̐ kaṭu koṭi kalapanā ||

157.4

बिप्र जेवाँइ देहिँ दिन दाना । सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना ॥
मागहिं हृदयँ महेस मनाई । कुसल मातु पितु परिजन भाई ॥

bipra jevām̐i dehim̐ dina dānā | siva abhiṣeka karahiṃ bidhi nānā ||
māgahiṃ hṛdayam̐ mahesa manāī | kusala mātu pitu parijana bhāī ||

दो॰ 157दोहा

एहि बिधि सोचत भरत मन, धावन पहुँचे आइ ।
गुरु-अनुसासन श्रवन सुनि, चले गनेस मनाइ ॥

ehi bidhi socata bharata mana, dhāvana pahum̐ce āi |
guru-anusāsana śravana suni, cale ganesa manāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0