अयोध्याकाण्ड

अध्याय 155: राम नाम लेते हुए दशरथ का देहत्याग

5 श्लोक · 155 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

राम नाम लेते हुए दशरथ का देहत्याग

धीरज धरकर राजा उठ बैठे और बोले, सुमन्त्र, कृपालु राम कहाँ हैं? लक्ष्मण कहाँ हैं, स्नेही राम कहाँ हैं, प्यारी पुत्रवधू वैदेही कहाँ हैं? राजा अनेक प्रकार विलाप करते हैं; रात युग के समान हो गई, बीतती ही नहीं। उन्हें अन्धे तपस्वी के शाप की सुधि आई और उन्होंने सारी कथा कौसल्या को सुनाई; वह वृत्तान्त कहते कहते वे और व्याकुल हो गए। राम के बिना जीने की आशा को धिक्कार है; जिस शरीर ने मेरा प्रेम का प्रण न निभाया, उसे रखकर क्या करूँ। हा रघुनन्दन, प्राणप्यारे, तुम्हारे बिना जीते बहुत दिन बीत गए। हा जानकी, हा लक्ष्मण, हा रघुवर, पिता के चित्त रूपी चातक के मेघ! दोहे में राम राम, फिर राम राम कहते हुए राजा रघुवर के विरह में शरीर छोड़कर देवलोक चले गए।

155.1

धरि धीरज उठि बैठि भुआलू । कहु सुमन्त्र कहँ राम-कृपालू ॥
कहाँ लखन कहँ राम सनेही । कहँ प्रिय-पुत्रवधू वैदेही ॥

dhari dhīraja uṭhi baiṭhi bhuālū | kahu sumantra kaham̐ rāma-kṛpālū ||
kahām̐ lakhana kaham̐ rāma sanehī | kaham̐ priya-putravadhū vaidehī ||

155.2

बिलपत राउ बिकल बहु भाँती । भइ जुग सरिस सिराति न राती ॥
तापस-अन्ध साप सुधि आई । कौसल्यहि सब कथा सुनाई ॥

bilapata rāu bikala bahu bhām̐tī | bhai juga sarisa sirāti na rātī ||
tāpasa-andha sāpa sudhi āī | kausalyahi saba kathā sunāī ||

155.3

भयउ बिकल बरनत इतिहासा । राम रहित धिग जीवन आसा ॥
सो तनु राखि करब मैं काहा । जेहि न प्रेम-पन मोर निबाहा ॥

bhayau bikala baranata itihāsā | rāma rahita dhiga jīvana āsā ||
so tanu rākhi karaba maiṃ kāhā | jehi na prema-pana mora nibāhā ||

155.4

हा रघुनन्दन प्रान-पिरीते । तुम्ह बिनु जियत बहुत दिन बीते ॥
हा जानकी लखन हा रघुबर । हा पितु-हित-चित-चातक-जलधर ॥

hā raghunandana prāna-pirīte | tumha binu jiyata bahuta dina bīte ||
hā jānakī lakhana hā raghubara | hā pitu-hita-cita-cātaka-jaladhara ||

दो॰ 155दोहा

राम राम कहि राम कहि, राम राम कहि राम ।
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ, राउ गयउ सुरधाम ॥

rāma rāma kahi rāma kahi, rāma rāma kahi rāma |
tanu parihari raghubara biraham̐, rāu gayau suradhāma ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0