अयोध्याकाण्ड

अध्याय 148: सुमन्त्र ने दशरथ को भूमि पर पाया

5 श्लोक · 148 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

सुमन्त्र ने दशरथ को भूमि पर पाया

रानियाँ अत्यन्त आतुर होकर पूछती हैं, पर उत्तर नहीं आता। न कान सुनते हैं न आँखें देखती हैं; जो मिलता है उसी से पूछते हैं, राजा कहाँ हैं। दासियाँ उनकी व्याकुलता देखकर उन्हें कौसल्या के भवन में ले गईं। वहाँ सुमन्त्र ने देखा कि राजा अमृतहीन चन्द्रमा जैसे हैं; आसन, शय्या और आभूषण छोड़कर अत्यन्त मलिन होकर भूमि पर पड़े हैं। वे ऐसे लम्बी साँसें लेते हैं मानो स्वर्ग से गिरे ययाति हों, और क्षण क्षण शोक से छाती ऐसे भरती है मानो पंख जलने पर सम्पाती गिरा हो। राम के प्रेमी राजा राम राम कहते हैं, फिर राम, लक्ष्मण, वैदेही पुकारते हैं। दोहे में मन्त्री ने जय जीव कहकर दण्डवत किया; सुनते ही राजा व्याकुल होकर उठे और बोले, सुमन्त्र, कहो राम कहाँ हैं।

148.1

अति आरति सब पूँछहिं रानी । उतरु न आव बिकल भइ बानी ॥
सुनइ न श्रवन नयन नहिँ सूझा । कहहु कहाँ नृप जेहि तेहि बूझा ॥

ati ārati saba pūm̐chahiṃ rānī | utaru na āva bikala bhai bānī ||
sunai na śravana nayana nahim̐ sūjhā | kahahu kahām̐ nṛpa jehi tehi būjhā ||

148.2

दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई । कौसल्या-गृहँ गईं लवाई ॥
जाइ सुमन्त्र दीख कस राजा । अमिय रहित जनु चन्द बिराजा ॥

dāsinha dīkha saciva bikalāī | kausalyā-gṛham̐ gaīṃ lavāī ||
jāi sumantra dīkha kasa rājā | amiya rahita janu canda birājā ||

148.3

आसन सयन बिभूषन हीना । परेउ भूमितल निपट मलीना ॥
लेइ उसास सोच एहि भाँती । सुरपुर-तेँ जनु खँसेउ जजाती ॥

āsana sayana bibhūṣana hīnā | pareu bhūmitala nipaṭa malīnā ||
lei usāsa soca ehi bhām̐tī | surapura-tem̐ janu kham̐seu jajātī ||

148.4

लेत सोच भरि छिन छिन छाती । जनु जरि पंख परेउ सम्पाती ॥
राम राम-कह राम सनेही । पुनि कह राम-लखन-बैदेही ॥

leta soca bhari china china chātī | janu jari paṃkha pareu sampātī ||
rāma rāma-kaha rāma sanehī | puni kaha rāma-lakhana-baidehī ||

दो॰ 148दोहा

देखि सचिवँ जय जीव कहि, कीन्हेउ दंड प्रनाम ।
सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति, कहु सुमन्त्र कहँ राम ॥

dekhi sacivam̐ jaya jīva kahi, kīnheu daṃḍa pranāma |
sunata uṭheu byākula nṛpati, kahu sumantra kaham̐ rāma ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0