अयोध्याकाण्ड

अध्याय 147: सूना रथ रात में अवध पहुँचा

5 श्लोक · 147 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

सूना रथ रात में अवध पहुँचा

इस प्रकार पछताते हुए सुमन्त्र तमसा के तट पर पहुँचे। उन्होंने निषादों को विदा किया; वे पाँव पड़कर शोक में लौटे। नगर में घुसते मन्त्री ऐसे सकुचाते हैं मानो गुरु, ब्राह्मण या गौ को मारा हो। दिन भर पेड़ के नीचे बैठे रहे और अँधेरा होने पर अवध में प्रवेश करके रथ द्वार पर रख महल में गए। जिन्होंने सुना, वे रथ देखने आए; रथ पहचानकर और घोड़ों को व्याकुल देखकर उनके शरीर धूप में ओलों की भाँति गलने लगे। नगर के लोग ऐसे व्याकुल हैं जैसे पानी घटने पर मछलियाँ। दोहे में मन्त्री का आना सुनकर पूरा रनिवास व्याकुल हो गया, और सुमन्त्र को वह भवन प्रेतों के निवास जैसा भयंकर लगा।

147.1

एहि बिधि करत पन्थ पछितावा । तमसा-तीर तुरत रथ आवा ॥
बिदा किये करि बिनय निषादा । फिरे पायँ परि बिकल-बिषादा ॥

ehi bidhi karata pantha pachitāvā | tamasā-tīra turata ratha āvā ||
bidā kiye kari binaya niṣādā | phire pāyam̐ pari bikala-biṣādā ||

147.2

पैठत नगर सचिव सकुचाई । जनु मारेसि गुरु-बाँभन-गाई ॥
बैठि बिटप तर दिवस गवाँवा । साँझ समय तब अवसर पावा ॥

paiṭhata nagara saciva sakucāī | janu māresi guru-bām̐bhana-gāī ||
baiṭhi biṭapa tara divasa gavām̐vā | sām̐jha samaya taba avasara pāvā ||

147.3

अवध प्रबेस कीन्ह अँधिआरें । पैठ भवन रथ राखि दुआरें ॥
जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाये । भूप द्वार रथ देखन आये ॥

avadha prabesa kīnha am̐dhiāreṃ | paiṭha bhavana ratha rākhi duāreṃ ||
jinha jinha samācāra suni pāye | bhūpa dvāra ratha dekhana āye ||

147.4

रथ पहिचानि बिकल लखि घोरे । गरहिं गात जिमि आतप ओरे ॥
नगर नारि-नर ब्याकुल, कैसे । निघटत नीर मीन-गन जैसे ॥

ratha pahicāni bikala lakhi ghore | garahiṃ gāta jimi ātapa ore ||
nagara nāri-nara byākula, kaise | nighaṭata nīra mīna-gana jaise ||

दो॰ 147दोहा

सचिव आगमन सुनत सबु, बिकल भयउ रनिवास ।
भवन भयङ्कर लाग तेहि, मानहुँ प्रेत-निवास ॥

saciva āgamana sunata sabu, bikala bhayau ranivāsa |
bhavana bhayaṅkara lāga tehi, mānahum̐ preta-nivāsa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0