सुमन्त्र का सोच चलता रहता है। दुखी माताएँ पूछेंगी, लक्ष्मण की माता पूछेंगी, तो मैं क्या सुखद सन्देश दूँगा। जब श्रीराम की माता बछड़े को याद करती गाय की भाँति दौड़ी आएँगी, तब यही उत्तर दूँगा कि राम, लक्ष्मण और वैदेही वन चले गए। अवध जाकर अब यही सुख लेना है। जब वह दुखी राजा पूछेंगे जिनका जीवन रघुनाथ के अधीन है, तब किस मुँह से कहूँगा कि राजकुमारों को पहुँचाकर कुशल से लौट आया। सन्देश सुनते ही राजा तिनके की भाँति शरीर छोड़ देंगे। दोहा कहता है कि प्रियतम जल के बिछुड़ने पर भी मेरा हृदय कीचड़ की तरह नहीं फटा; विधाता ने मुझे यातना भोगने के लिए ही यह शरीर दिया है।