अयोध्याकाण्ड

अध्याय 145: अयोध्या का सामना करने का भय

5 श्लोक · 145 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

अयोध्या का सामना करने का भय

सुमन्त्र के हृदय में ऐसी दारुण जलन है जैसे पतिव्रता कुलीन स्त्री भाग्यवश पति को छोड़कर रहने को विवश हो। आँखें भरी हैं, दृष्टि धुँधली है, कान सुनते नहीं, बुद्धि भ्रमित है। होंठ सूखे हैं, जीभ चिपक गई है; प्राण केवल इसलिए नहीं जाते कि चौदह वर्ष की अवधि हृदय के किवाड़ बनकर रोके है। मुख ऐसा विवर्ण है मानो माता पिता को मार डाला हो; हानि और ग्लानि ऐसे छाई है जैसे पापी यमपुर के मार्ग में सोचता है। वे सोचते हैं, अवध जाकर क्या देखूँगा; जो राम के बिना रथ देखेगा, वह मुझे देखते सकुचाएगा। दोहे में वे सोचते हैं कि जब व्याकुल नगरवासी दौड़कर पूछेंगे, तब हृदय पर वज्र रखकर उत्तर दूँगा।

145.1

जिमि कुलीन तिय साधु सयानी । पतिदेवता करम-मन-बानी ॥
रहइ करम-बस परिहरि नाहू । सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु ॥

jimi kulīna tiya sādhu sayānī | patidevatā karama-mana-bānī ||
rahai karama-basa parihari nāhū | saciva hṛdayam̐ timi dāruna dāhu ||

145.2

लोचन सजल डीठि भइ थोरी । सुनइ न स्रवन विकल मति भोरी ॥
सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी । जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी ॥

locana sajala ḍīṭhi bhai thorī | sunai na sravana vikala mati bhorī ||
sūkhahiṃ adhara lāgi muham̐ lāṭī | jiu na jāi ura avadhi kapāṭī ||

145.3

बिबरन भयउ न जाइ निहारी । मारेसि मनहुँ पिता महतारी ॥
हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी । जमपुर पन्थ सोच जिमि पापी ॥

bibarana bhayau na jāi nihārī | māresi manahum̐ pitā mahatārī ||
hāni galāni bipula mana byāpī | jamapura pantha soca jimi pāpī ||

145.4

बचन न आव हृदयँ पछिताई । अवध काह मैं देखब जाई ॥
राम रहित रथ देखिहि जोई । सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई ॥

bacana na āva hṛdayam̐ pachitāī | avadha kāha maiṃ dekhaba jāī ||
rāma rahita ratha dekhihi joī | sakucihi mohi bilokata soī ||

दो॰ 145दोहा

धाइ पूँछिहहिं मोहि जब, बिकल नगर नर नारि ।
उत्तर देब मैं सबहि तब, हृदयँ बज्रु बैठारि ॥

dhāi pūm̐chihahiṃ mohi jaba, bikala nagara nara nāri |
uttara deba maiṃ sabahi taba, hṛdayam̐ bajru baiṭhāri ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0