अयोध्याकाण्ड

अध्याय 144: लौटते मार्ग में सुमन्त्र का पछतावा

5 श्लोक · 144 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

लौटते मार्ग में सुमन्त्र का पछतावा

गुह सारथी को पहुँचाकर लौटा; उसके विरह का दुःख कहा नहीं जाता। निषाद रथ लेकर अवध चले और क्षण क्षण शोक में डूबते रहे। सुमन्त्र सोचते हैं, रघुवीर के बिना जीवन को धिक्कार है। यह अधम शरीर अन्त में तो रहेगा ही नहीं, फिर रघुवीर से बिछुड़ते समय इसने यश क्यों न पाया। ये प्राण अपयश और पाप के भागी हुए, फिर भी क्यों नहीं निकलते। हाय, मन्दबुद्धि मन ने अवसर चूक दिया, अब भी हृदय के दो टुकड़े नहीं होते। वे हाथ मलकर और सिर धुनकर ऐसे पछताते हैं मानो कंजूस ने धन का ढेर गँवा दिया हो, या बड़ा वीर कहलाने वाला योद्धा रण से भाग आया हो। दोहे में मन्त्री ऐसे सोच में हैं जैसे कोई विवेकी, वेदज्ञ, कुलीन ब्राह्मण धोखे से मदिरा पी बैठा हो।

144.1

गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई । बिरह बिषाद बरनि नहिं जाई ॥
चले अवध लेइ रथहि निषादा । होहिँ छनहिँ छन मगन बिषादा ॥

guha sārathihi phireu pahum̐cāī | biraha biṣāda barani nahiṃ jāī ||
cale avadha lei rathahi niṣādā | hohim̐ chanahim̐ chana magana biṣādā ||

144.2

सोच सुमन्त्र बिकल दुख-दीना । धिग जीवन रघुवीर बिहीना ॥
रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू । जस न लहेउ बिछुरत रघुबीरू ॥

soca sumantra bikala dukha-dīnā | dhiga jīvana raghuvīra bihīnā ||
rahihi na aṃtahum̐ adhama sarīrū | jasa na laheu bichurata raghubīrū ||

144.3

भये अजस-अघ-भाजन प्राना । कवन हेतु नहिँ करत पयाना ॥
अहह मन्द-मन अवसर चूका । अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका ॥

bhaye ajasa-agha-bhājana prānā | kavana hetu nahim̐ karata payānā ||
ahaha manda-mana avasara cūkā | ajahum̐ na hṛdaya hota dui ṭūkā ||

144.4

मीजि हाथ सिर धुनि पछिताई । मनहुँ कृपन धन-रासि गवाँई ॥
बिरद बाँधि बर बीर कहाई । चलेउ समर जनु सुभट पराई ॥

mīji hātha sira dhuni pachitāī | manahum̐ kṛpana dhana-rāsi gavām̐ī ||
birada bām̐dhi bara bīra kahāī | caleu samara janu subhaṭa parāī ||

दो॰ 144दोहा

विप्र बिबेकी बेदबिद, संमत-साधु सुजाति ।
जिमि धोखें मदपान कर, सचिव सोच तेहि भाँति ॥

vipra bibekī bedabida, saṃmata-sādhu sujāti |
jimi dhokheṃ madapāna kara, saciva soca tehi bhām̐ti ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0