अयोध्याकाण्ड

अध्याय 141: अवध की सुधि में श्रीराम के आँसू

5 श्लोक · 141 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

अवध की सुधि में श्रीराम के आँसू

जिससे सीता और लक्ष्मण सुख पाएँ, रघुनाथ वही करते और कहते हैं। वे पुरानी कथाएँ सुनाते हैं और दोनों बड़े सुख से सुनते हैं। पर जब जब श्रीराम अवध की सुधि करते हैं, उनके नेत्र भर आते हैं। माता, पिता, परिजन और भरत के स्नेह तथा सेवा को स्मरण करके कृपासिन्धु प्रभु दुखी होते हैं, फिर कुसमय जानकर धीरज धरते हैं। उन्हें देखकर सीता और लक्ष्मण भी वैसे ही व्याकुल हो जाते हैं जैसे परछाईं पुरुष के पीछे चलती है। यह देखकर धीर और कृपालु प्रभु कोई पवित्र कथा कहने लगते हैं, जिससे दोनों को सुख मिलता है। दोहे में राम, लक्ष्मण और सीता सहित पर्णकुटी ऐसे शोभित है जैसे शची और जयन्त सहित इन्द्र अमरावती में।

141.1

सीय-लखन जेहि बिधि सुख लहहीं । सोइ रघुनाथ करहिं सोइ कहहीं ॥
कहहिँ पुरातन कथा कहानी । सुनहिँ लखन सिय अति सुख मानी ॥

sīya-lakhana jehi bidhi sukha lahahīṃ | soi raghunātha karahiṃ soi kahahīṃ ||
kahahim̐ purātana kathā kahānī | sunahim̐ lakhana siya ati sukha mānī ||

141.2

जब जब राम अवध सुधि करहीं । तब तब बारि बिलोचन भरहीं ॥
सुमिरि मातु पितु परिजन भाई । भरत सनेह सील-सेवकाई ॥

jaba jaba rāma avadha sudhi karahīṃ | taba taba bāri bilocana bharahīṃ ||
sumiri mātu pitu parijana bhāī | bharata saneha sīla-sevakāī ||

141.3

कृपासिन्धु प्रभु होहिँ दुखारी । धीरज धरहिँ कुसमउ, बिचारी ॥
लखि सिय-लखन विकल होइ जाहीँ । जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं ॥

kṛpāsindhu prabhu hohim̐ dukhārī | dhīraja dharahim̐ kusamau, bicārī ||
lakhi siya-lakhana vikala hoi jāhīm̐ | jimi puruṣahi anusara parichāhīṃ ||

141.4

प्रिया-बन्धु गति लखि रघुनन्दन । धीर कृपाल भगत-उर चन्दन ॥
लगे कहन कछु कथा पुनीता । सुनि सुख लहहिँ लखन अरु सीता ॥

priyā-bandhu gati lakhi raghunandana | dhīra kṛpāla bhagata-ura candana ||
lage kahana kachu kathā punītā | suni sukha lahahim̐ lakhana aru sītā ||

दो॰ 141दोहा

राम-लखन-सीता सहित, सोहत परन-निकेत ।
जिमि बासव बस अमरपुर, सची जयन्त समेत ॥

rāma-lakhana-sītā sahita, sohata parana-niketa |
jimi bāsava basa amarapura, sacī jayanta sameta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0