अयोध्याकाण्ड

अध्याय 138: समस्त सृष्टि चित्रकूट का यश गाती है

5 श्लोक · 138 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

समस्त सृष्टि चित्रकूट का यश गाती है

हाथी, सिंह, बन्दर, सूअर और हिरन वैर छोड़कर एक साथ विचरते हैं। शिकार के लिए घूमते श्रीराम की छवि देखकर हिरनों के झुण्ड विशेष प्रसन्न होते हैं। जगत में जितने भी देवताओं के वन हैं, सब श्रीराम के वन को देखकर सिहाते हैं। गंगा, सरस्वती, सूर्यकन्या यमुना, मेकलसुता नर्मदा और धन्य गोदावरी, सब सरोवर, समुद्र, नदी और नद मन्दाकिनी का बखान करते हैं। उदयाचल, अस्ताचल, कैलास, मन्दर, देवताओं का निवास मेरु, और हिमाचल आदि जितने पर्वत हैं, सब चित्रकूट का यश गाते हैं। विन्ध्याचल का मन इतना प्रसन्न है कि सुख समाता नहीं, क्योंकि उसने बिना परिश्रम बड़ी बड़ाई पा ली। दोहे में देवता दिन रात कहते हैं कि चित्रकूट के पक्षी, पशु, बेलें, वृक्ष और तृण सब पुण्य के पुंज हैं और धन्य हैं।

138.1

केरि केहरि कपि कोल कुरङ्गा । बिगत बैर बिचरहिं सब सङ्गा ॥
फिरत अहेर राम छबि देखी । होहिं मुदित मृगबन्द बिसेखी ॥

keri kehari kapi kola kuraṅgā | bigata baira bicarahiṃ saba saṅgā ||
phirata ahera rāma chabi dekhī | hohiṃ mudita mṛgabanda bisekhī ||

138.2

बिबुध-बिपिन जहँ लगि जग माहीं । देखि राम-बन सकल सिहाहीं ॥
सुरसरि सरसइ दिनकर-कन्या । मेकल सुता गोदावरि धन्या ॥

bibudha-bipina jaham̐ lagi jaga māhīṃ | dekhi rāma-bana sakala sihāhīṃ ||
surasari sarasai dinakara-kanyā | mekala sutā godāvari dhanyā ||

138.3

सब सर सिन्धु नदी नद नाना । मन्दाकिनि कर करहिँ बखाना ॥
उदय-अस्त-गिरि अरु कैलासू । मन्दर मेरु सकल-सुर-बासू ॥

saba sara sindhu nadī nada nānā | mandākini kara karahim̐ bakhānā ||
udaya-asta-giri aru kailāsū | mandara meru sakala-sura-bāsū ||

138.4

सैल हिमाचल आदिक जेते । चित्रकूट जस गावहिँ तेते ॥
बिन्धि मुदित मन सुख न समाई । सम बिनु बिपुल बड़ाई पाई ॥

saila himācala ādika jete | citrakūṭa jasa gāvahim̐ tete ||
bindhi mudita mana sukha na samāī | sama binu bipula bar̤āī pāī ||

दो॰ 138दोहा

चित्रकूट के बिहग मृग, बेलि बिटप तन-जाति ।
पुन्य-पुञ्ज सब धन्य अस, कहहिँ देव दिन राति ॥

citrakūṭa ke bihaga mṛga, beli biṭapa tana-jāti |
punya-puñja saba dhanya asa, kahahim̐ deva dina rāti ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0