रामहि केवल प्रेम पियारा । जानि लेउ जो जाननिहारा ॥
राम सकल बनचर तब तोषे । कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे ॥
rāmahi kevala prema piyārā | jāni leu jo jānanihārā ||
rāma sakala banacara taba toṣe | kahi mṛdu bacana prema paripoṣe ||
5 श्लोक · 137 में से 326
गोस्वामीजी कहते हैं, श्रीराम को केवल प्रेम प्यारा है; जो जानने वाला हो वह जान ले। श्रीराम ने कोमल वचनों से सब वनवासियों को सन्तुष्ट करके विदा किया और वे प्रभु के गुण गाते घर गए। इस प्रकार सीता सहित दोनों भाई देवताओं और मुनियों को सुख देते हुए वन में बसते हैं। जब से रघुनायक आए, वन मंगलदायक हो गया। वृक्ष फूलते फलते हैं, उन पर बेलों के मण्डप छाए हैं, मानो कल्पवृक्ष के समान देवताओं के वन यहाँ आ गए हों। भौंरे गुंजार करते हैं और शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन बहती है। दोहे में नीलकण्ठ, कोयल, तोते, चातक, चकवे और चकोर भाँति भाँति बोलते हैं, जो कानों को सुख देते और मन चुराते हैं।
रामहि केवल प्रेम पियारा । जानि लेउ जो जाननिहारा ॥
राम सकल बनचर तब तोषे । कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे ॥
rāmahi kevala prema piyārā | jāni leu jo jānanihārā ||
rāma sakala banacara taba toṣe | kahi mṛdu bacana prema paripoṣe ||
बिदा किये सिर नाइ सिधाये । प्रभु गुन कहत सुनत घर आये ॥
एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई । बसहिँ बिपिन सुर-मुनि-सुखदाई ॥
bidā kiye sira nāi sidhāye | prabhu guna kahata sunata ghara āye ||
ehi bidhi siya sameta dou bhāī | basahim̐ bipina sura-muni-sukhadāī ||
जब ते आइ रहे रघुनायक । तब तैं भयउ धन मङ्गल दायक ॥
फूलहिँ फलहिँ बिटप बिधि नाना । मञ्जु-बलित-बर-बेलि-बिताना ॥
jaba te āi rahe raghunāyaka | taba taiṃ bhayau dhana maṅgala dāyaka ||
phūlahim̐ phalahim̐ biṭapa bidhi nānā | mañju-balita-bara-beli-bitānā ||
सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाये । मनहुँ बिबुध बन परिहरि आये ॥
गंज मंजुतर मधुकर-श्रेनी । त्रिबिधि बयारि बहइ सुख देनी ॥
surataru sarisa subhāyam̐ suhāye | manahum̐ bibudha bana parihari āye ||
gaṃja maṃjutara madhukara-śrenī | tribidhi bayāri bahai sukha denī ||
नीलकंठ कलकंठ सुक, चातक चक्क चकोर ।
भाँति भाँति बोलहिँ बिहग, श्रवन-सुखद चित-चोर ॥
nīlakaṃṭha kalakaṃṭha suka, cātaka cakka cakora |
bhām̐ti bhām̐ti bolahim̐ bihaga, śravana-sukhada cita-cora ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0