अयोध्याकाण्ड

अध्याय 139: चित्रकूट में लक्ष्मण की सेवा

5 श्लोक · 139 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

चित्रकूट में लक्ष्मण की सेवा

आँख वाले जीव श्रीराम को देखकर जन्म का फल पाते हैं और शोकरहित होते हैं; अचर भी उनकी चरणरज छूकर परम पद के अधिकारी हो जाते हैं। वह वन और पर्वत मंगलमय और पवित्रों को भी पवित्र करने वाले हैं। उस स्थान की महिमा कौन कहे जहाँ सुखसागर ने क्षीरसागर और अवध छोड़कर सीता और लक्ष्मण सहित निवास किया। लाखों शेष भी उसकी शोभा नहीं कह सकते; फिर मैं कैसे कहूँ, क्या गड्ढे का कछुआ मन्दराचल उठा सकता है। लक्ष्मण कर्म, मन और वचन से सेवा करते हैं। दोहे में क्षण क्षण सीता और श्रीराम के चरण देखकर और उनका स्नेह जानकर लक्ष्मण स्वप्न में भी माता, पिता या घर को याद नहीं करते।

139.1

नयनवंत रघुबरहि बिलोकी । पाइ जनम फल होहिँ बिसोकी ॥
परसि चरन-रज अचर सुखारी । भये परम पद के अधिकारी ॥

nayanavaṃta raghubarahi bilokī | pāi janama phala hohim̐ bisokī ||
parasi carana-raja acara sukhārī | bhaye parama pada ke adhikārī ||

139.2

से बन सैल सुभायँ सुहावन । मङ्गल-मय अति पावन पावन ॥
महिमा कहिय कवनि बिधि तासू । सुख सागर जहँ कीन्ह निवासू ॥

se bana saila subhāyam̐ suhāvana | maṅgala-maya ati pāvana pāvana ||
mahimā kahiya kavani bidhi tāsū | sukha sāgara jaham̐ kīnha nivāsū ||

139.3

पय-पयोधि तजि अवध बिहाई । जहँ सिय-लखन-राम रहे आई ॥
कहि न सकहिँ सुखमा जसि कानन । जौँ सत-सहस होहिं सहसानन ॥

paya-payodhi taji avadha bihāī | jaham̐ siya-lakhana-rāma rahe āī ||
kahi na sakahim̐ sukhamā jasi kānana | jaum̐ sata-sahasa hohiṃ sahasānana ||

139.4

सो मैं बरनि कहउँ बिधि केहीं । डाबर कमठ कि मन्दर लेहीं ॥
सेवहिँ लखन करम मन-बानी । जाइ न सील सनेह बखानी ॥

so maiṃ barani kahaum̐ bidhi kehīṃ | ḍābara kamaṭha ki mandara lehīṃ ||
sevahim̐ lakhana karama mana-bānī | jāi na sīla saneha bakhānī ||

दो॰ 139दोहा

छिन छिन लखि सिय-राम-पद, जानि आपु पर नेह ।
करत न सपनेहुँ लखन चित, बन्धु-मातु-पितु-गेह ॥

china china lakhi siya-rāma-pada, jāni āpu para neha |
karata na sapanehum̐ lakhana cita, bandhu-mātu-pitu-geha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0