अयोध्याकाण्ड

अध्याय 136: वनवासियों का सेवा का वचन

5 श्लोक · 136 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

वनवासियों का सेवा का वचन

किरात आगे कहते हैं, धन्य हैं वह भूमि, वन, मार्ग और पर्वत जहाँ नाथ ने पाँव रखे; धन्य हैं वे पक्षी और मृग जिनका जन्म आपको देखकर सफल हुआ; परिवार सहित हम भी धन्य हैं। आपने अच्छी जगह निवास किया है, यहाँ सब ऋतुओं में सुख से रहेंगे। हम हाथी, सिंह, साँप और बाघ से बचाकर सब प्रकार सेवा करेंगे। बीहड़ वन, कन्दराएँ और खोहें हमारी पग पग की देखी हुई हैं; हम आपको शिकार खिलाएँगे और सरोवर तथा झरने दिखाएँगे। आज्ञा देने में संकोच न कीजिए। दोहा कहता है कि जो करुणानिधान प्रभु वेद और मुनियों के मन से भी अगम्य हैं, वे किरातों के वचन ऐसे सुनते हैं जैसे पिता बालक की तोतली बोली।

136.1

धन्य भूमि बन पन्थ पहारा । जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा ॥
धन्य बिहग मृग काननचारी । सफल जनम भए तुम्हहिँ निहारी ॥

dhanya bhūmi bana pantha pahārā | jaham̐ jaham̐ nātha pāu tumha dhārā ||
dhanya bihaga mṛga kānanacārī | saphala janama bhae tumhahim̐ nihārī ||

136.2

हम सब धन्य सहित परिवारा । दीख दरस भरि नयन तुम्हारा ॥
कीन्ह बास भल ठाउँ बिचारी । इहाँ सकल रितु रहब सुखारी ॥

hama saba dhanya sahita parivārā | dīkha darasa bhari nayana tumhārā ||
kīnha bāsa bhala ṭhāum̐ bicārī | ihām̐ sakala ritu rahaba sukhārī ||

136.3

हम सब भाँति करब सेवकाई । करि-केहरि-अहि-बाघ बराई ॥
बन बेहड़ गिरि कन्दर खोहा । सब हमार प्रभु पग पग जोहा ॥

hama saba bhām̐ti karaba sevakāī | kari-kehari-ahi-bāgha barāī ||
bana behar̤a giri kandara khohā | saba hamāra prabhu paga paga johā ||

136.4

जहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब । सर निरझर जलठाउँ देखाउब ॥
हम सेवक परिवार समेता । नाथ न सकुचब आयसु देता ॥

jaham̐ taham̐ tumhahi ahera khelāuba | sara nirajhara jalaṭhāum̐ dekhāuba ||
hama sevaka parivāra sametā | nātha na sakucaba āyasu detā ||

दो॰ 136दोहा

बेद-बचन मुनि-मन-अगम, ते प्रभु करुना अयन ।
बचन किरातन्ह के सुनत, जिमि पितु बालक-बैन ॥

beda-bacana muni-mana-agama, te prabhu karunā ayana |
bacana kirātanha ke sunata, jimi pitu bālaka-baina ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0