अयोध्याकाण्ड

अध्याय 130: विकारों से रहित हृदयों में निवास

5 श्लोक · 130 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

विकारों से रहित हृदयों में निवास

वाल्मीकि प्रभु के योग्य हृदय के लक्षण बताते हैं। जिनमें काम, क्रोध, मद, मान और मोह नहीं, लोभ, राग और द्रोह नहीं, कपट और दम्भ नहीं, उनके हृदय में बसिए। जो सबके प्रिय और हितकारी हैं, दुःख सुख और प्रशंसा गाली में समान रहते हैं, सोचकर सत्य और प्रिय बोलते हैं, और जागते सोते आपकी ही शरण में रहते हैं, उनके मन में बसिए। जो परायी स्त्री को माता और पराये धन को भारी विष मानते हैं, दूसरों की सम्पत्ति देखकर हर्षित और विपत्ति देखकर दुखी होते हैं, और जिन्हें आप प्राणों से प्यारे हैं, उनके मन आपके शुभ भवन हैं। दोहे में मुनि कहते हैं कि जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब आप ही हैं, उनके मनमन्दिर में सीता सहित दोनों भाई बसें।

130.1

काम कोह मद मान न मोहा । लोभ न छोभ न राग न द्रोहा ॥
जिन्ह कें कपट दम्भ नहिँ माया । तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया ॥

kāma koha mada māna na mohā | lobha na chobha na rāga na drohā ||
jinha keṃ kapaṭa dambha nahim̐ māyā | tinha keṃ hṛdaya basahu raghurāyā ||

130.2

सब के प्रिय सब के हितकारी । दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी ॥
कहहिँ सत्य प्रिय-बचन-बिचारी । जागत सोवत सरन तुम्हारी ॥

saba ke priya saba ke hitakārī | dukha sukha sarisa prasaṃsā gārī ||
kahahim̐ satya priya-bacana-bicārī | jāgata sovata sarana tumhārī ||

130.3

तुम्हहिँ छाडि गति दूसरि नाहीँ । राम बसहु तिन्ह के मन माहीं ॥
जननी सम जानहिँ पर-नारी । धन पराव बिष तेँ विष भारी ॥

tumhahim̐ chāḍi gati dūsari nāhīm̐ | rāma basahu tinha ke mana māhīṃ ||
jananī sama jānahim̐ para-nārī | dhana parāva biṣa tem̐ viṣa bhārī ||

130.4

जे हरषहिँ पर-सम्पति देखी । दुखित होहिँ पर-बिपति-बिसेखी ॥
जिन्हहिं राम तुम्ह प्रान-पियारे । तिन्ह के मन सुभ-सदन-तुम्हारे ॥

je haraṣahim̐ para-sampati dekhī | dukhita hohim̐ para-bipati-bisekhī ||
jinhahiṃ rāma tumha prāna-piyāre | tinha ke mana subha-sadana-tumhāre ||

दो॰ 130दोहा

स्वामि-सखा-पितु-मातु-गुरु, जिन्ह के सब तुम्ह तात ।
मन-मन्दिर तिन्ह कें बसहु, सीय सहित दोउ भ्रात ॥

svāmi-sakhā-pitu-mātu-guru, jinha ke saba tumha tāta |
mana-mandira tinha keṃ basahu, sīya sahita dou bhrāta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0