अयोध्याकाण्ड

अध्याय 129: पूजा करने वालों के हृदय में निवास

5 श्लोक · 129 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

पूजा करने वालों के हृदय में निवास

वाल्मीकि आगे कहते हैं। जो प्रभु को अर्पित सुगन्ध आदर से ग्रहण करते हैं, आपको निवेदित भोजन ही करते हैं और प्रसाद रूपी वस्त्र और आभूषण पहनते हैं; जो देवता, गुरु और ब्राह्मण को देखकर प्रेम से सिर नवाते हैं; जिनके हाथ नित श्रीराम के चरण पूजते हैं और हृदय में दूसरा भरोसा नहीं; जिनके पाँव राम के तीर्थों को चलते हैं, उनके मन में बसिए। जो नित आपके मन्त्रराज का जप करते हैं, परिवार सहित आपकी पूजा करते हैं, तर्पण और होम करते हैं, ब्राह्मणों को जिमाकर दान देते हैं, और गुरु को आपसे भी बड़ा मानकर सेवा करते हैं; जो यह सब करके एक ही फल माँगते हैं कि श्रीराम के चरणों में प्रीति हो, उनके मनमन्दिर में सीता और रघुनन्दन दोनों बसें।

129.1

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा । सादर जासु लहइ नित नासा ॥
तुम्हहिँ निबेदित भोजन करहीं । प्रभु-प्रसाद पट भूषन धरहीँ ॥

prabhu prasāda suci subhaga subāsā | sādara jāsu lahai nita nāsā ||
tumhahim̐ nibedita bhojana karahīṃ | prabhu-prasāda paṭa bhūṣana dharahīm̐ ||

129.2

सीस नवहिँ सुर-गुरु-द्विज देखी । प्रीति सहित करि बिनय बिसेखी ॥
कर नित करहिं राम-पद-पूजा । राम-भरोस हृदयँ नहिँ दूजा ॥

sīsa navahim̐ sura-guru-dvija dekhī | prīti sahita kari binaya bisekhī ||
kara nita karahiṃ rāma-pada-pūjā | rāma-bharosa hṛdayam̐ nahim̐ dūjā ||

129.3

चरन राम-तीरथ चलि जाहीं । राम बसहु तिन्ह के मन माहीं ॥
मन्त्रराज नित जपहिँ तुम्हारा । पूजहिँ तुम्हहिँ सहित परिवारा ॥

carana rāma-tīratha cali jāhīṃ | rāma basahu tinha ke mana māhīṃ ||
mantrarāja nita japahim̐ tumhārā | pūjahim̐ tumhahim̐ sahita parivārā ||

129.4

तरपन होम करहिँ बिधि नाना । बिप्र जेवाँइ देहिँ बहु दाना ॥
तुम्ह तेँ अधिक गुरुहि जियँ जानी । सकल भायँ सेवहिँ सनमानी ॥

tarapana homa karahim̐ bidhi nānā | bipra jevām̐i dehim̐ bahu dānā ||
tumha tem̐ adhika guruhi jiyam̐ jānī | sakala bhāyam̐ sevahim̐ sanamānī ||

दो॰ 129दोहा

सब करि मागहिं एक फल, राम-चरन रति होउ ।
तिन्ह कें मन-मन्दिर बसहु, सिय-रघुनन्दन दोउ ॥

saba kari māgahiṃ eka phala, rāma-carana rati hou |
tinha keṃ mana-mandira basahu, siya-raghunandana dou ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0