अयोध्याकाण्ड

अध्याय 126: श्रीराम निवास का स्थान पूछते हैं

6 श्लोक · 126 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम निवास का स्थान पूछते हैं

श्रीराम कहते हैं कि मुनि के चरणों के दर्शन से मेरे सब पुण्य सफल हो गए। अब जहाँ आपकी आज्ञा हो वहीं रहूँ, जहाँ किसी मुनि को उद्वेग न हो, क्योंकि तपस्वियों को दुःख देने वाले राजा बिना अग्नि के जल जाते हैं; ब्राह्मण का सन्तोष मंगल का मूल है और उसका क्रोध करोड़ों कुलों को भस्म करता है। इसलिए कुटी का स्थान बताइए। मुनि बोले, साधु साधु; वेद की मर्यादा के रक्षक ऐसा क्यों न कहें। छन्द में वे कहते हैं कि श्रीराम जगदीश्वर हैं, जानकी उनकी माया हैं जो जगत रचती, पालती और संहारती हैं, लक्ष्मण सहस्रशीश शेष हैं, और राक्षसों के संहार हेतु प्रभु ने नर शरीर धरा है। सोरठा कहता है कि उनका स्वरूप वाणी और बुद्धि से परे है, वेद नेति नेति कहते हैं।

126.1

देखि पाय मुनि-राय तुम्हारे । भये सुकृत सब सुफल हमारे ॥
अब जहँ राउर आयसु होई । मुनि उदबेग न पावै कोई ॥

dekhi pāya muni-rāya tumhāre | bhaye sukṛta saba suphala hamāre ||
aba jaham̐ rāura āyasu hoī | muni udabega na pāvai koī ||

126.2

मुनि-तापस जिन्ह तेँ दुख लहहीं । ते नरेस बिनु पावक दहहीँ ॥
मङ्गल-मूल विप्र-परितोषू । दहइ कोटि-कुल भूसुर रोषू ॥

muni-tāpasa jinha tem̐ dukha lahahīṃ | te naresa binu pāvaka dahahīm̐ ||
maṅgala-mūla vipra-paritoṣū | dahai koṭi-kula bhūsura roṣū ||

126.3

अस जियँ जानि कहिय सोइ ठाऊँ । सिय-सौमित्रि-सहित जहँ जाऊँ ॥
तहँ रचि रुचिर परन-तन-साला । बास करउँ कछु काल कृपाला ॥

asa jiyam̐ jāni kahiya soi ṭhāūm̐ | siya-saumitri-sahita jaham̐ jāūm̐ ||
taham̐ raci rucira parana-tana-sālā | bāsa karaum̐ kachu kāla kṛpālā ||

126.4

सहज सरल सुनि रघुबर बानी । साधु साधु बोले मुनि-ज्ञानी ॥
कस न कहहु अस रघुकुल-केतू । तुम्ह पालक सन्तत श्रुति-सेतू ॥

sahaja sarala suni raghubara bānī | sādhu sādhu bole muni-jñānī ||
kasa na kahahu asa raghukula-ketū | tumha pālaka santata śruti-setū ||

126.छं॰ 1छन्द

श्रुति-सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी ।
जो सृजति जग पालति हरति रुख, पाइ कृपानिधान की ॥
जो सहससीसु-अहीस महिधर, लखन सचराचर धनी ।
सुर काज धरि नरराज तनु चले, दलन खल निसिचर अनी ॥

śruti-setu pālaka rāma tumha jagadīsa māyā jānakī |
jo sṛjati jaga pālati harati rukha, pāi kṛpānidhāna kī ||
jo sahasasīsu-ahīsa mahidhara, lakhana sacarācara dhanī |
sura kāja dhari nararāja tanu cale, dalana khala nisicara anī ||

126.सो॰ 126सोरठा

राम सरूप तुम्हार, बचन अगोचर बुद्धि पर ।
अबिगत अकथ अपार, नेति नित निगम कह ॥

rāma sarūpa tumhāra, bacana agocara buddhi para |
abigata akatha apāra, neti nita nigama kaha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0