अयोध्याकाण्ड

अध्याय 113: रामपथ के स्थानों से देवलोक भी सिहाता

5 श्लोक · 113 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

रामपथ के स्थानों से देवलोक भी सिहाता

मार्ग में जो पुर और गाँव बसे हैं, उन्हें देखकर नागों और देवताओं के नगर सिहाते हैं कि किस पुण्यात्मा ने किस शुभ घड़ी में इन्हें बसाया। जहाँ जहाँ राम के चरण जाते हैं, अमरावती भी उनके समान नहीं। देवलोकवासी मार्ग के निकट रहने वालों की सराहना करते हैं। जिन सरोवरों और नदियों में राम स्नान करते हैं, उनकी देवताओं के सरोवर और नदियाँ बड़ाई करती हैं। जिस वृक्ष के नीचे प्रभु बैठते हैं, कल्पवृक्ष उसकी बड़ाई करता है, और रामचरणों की धूल छूकर पृथ्वी अपना बड़ा भाग्य मानती है। बादल छाया करते हैं, देवता फूल बरसाकर सिहाते हैं, और पर्वत, वन, पक्षी और मृग देखते हुए राम मार्ग पर चलते जाते हैं।

113.1

जे पुर गाँव बसहिँ मग माहीं । तिन्हहिँ नाग-सुर नगर सिहाहीं ॥
केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाये । धन्य पुन्य मय परम सुहाये ॥

je pura gām̐va basahim̐ maga māhīṃ | tinhahim̐ nāga-sura nagara sihāhīṃ ||
kehi sukṛtīṃ kehi gharīṃ basāye | dhanya punya maya parama suhāye ||

113.2

जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीँ । तिन्ह समान अमरावति नाहीँ ॥
पुन्य पुज्ज मग निकट निवासी । तिन्हहिँ सराहहिँ सुरपुरबासी ॥

jaham̐ jaham̐ rāma carana cali jāhīm̐ | tinha samāna amarāvati nāhīm̐ ||
punya pujja maga nikaṭa nivāsī | tinhahim̐ sarāhahim̐ surapurabāsī ||

113.3

जे भरि नयन बिलोकहिँ रामहि । सीला लखन सहित घनस्यामहि ॥
जे सर सरित राम अवगाहहिं । तिन्हहिं देव सर सरित सराहहिँ ॥

je bhari nayana bilokahim̐ rāmahi | sīlā lakhana sahita ghanasyāmahi ||
je sara sarita rāma avagāhahiṃ | tinhahiṃ deva sara sarita sarāhahim̐ ||

113.4

जेहि तरु तर प्रभु बैठहिँ जाई । करहिँ, कलपतरु तासु बड़ाई ॥
परसि राम-पद-पदुम परागा । मानति भूमि भूरि निज भागा ॥

jehi taru tara prabhu baiṭhahim̐ jāī | karahim̐, kalapataru tāsu bar̤āī ||
parasi rāma-pada-paduma parāgā | mānati bhūmi bhūri nija bhāgā ||

दो॰ 113दोहा

छाँह करहिँ घन बिबुधगन, बरषहिँ सुमन सिहाहिँ ।
देखत गिरि बन बिहँग मृग, राम चले मग जाहिँ ॥

chām̐ha karahim̐ ghana bibudhagana, baraṣahim̐ sumana sihāhim̐ |
dekhata giri bana biham̐ga mṛga, rāma cale maga jāhim̐ ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0