अयोध्याकाण्ड

अध्याय 114: दर्शन को दौड़े ग्रामवासियों की तन्मयता

5 श्लोक · 114 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

दर्शन को दौड़े ग्रामवासियों की तन्मयता

सीता और लक्ष्मण सहित रघुराई जब किसी गाँव के पास से निकलते हैं, तो सब लोग घर का काम भूलकर दौड़ पड़ते हैं। राम, लक्ष्मण और सीता का रूप देखकर वे नेत्रों का फल पाकर सुखी होते हैं। पुलकित शरीर से सब मग्न हो जाते हैं। उनकी दशा कही नहीं जाती, मानो कंगालों को चिन्तामणियों का ढेर मिल गया हो। कोई प्रेम में भरकर राम को निहारते हुए साथ लगे चले जाते हैं। कोई आँखों के मार्ग से छवि को हृदय में लाकर तन मन से शिथिल हो जाते हैं। कोई बरगद की अच्छी छाँह देखकर कोमल घास और पत्ते बिछाते हैं और कहते हैं, क्षण भर थकान मिटाइए, फिर अभी या सबेरे जाइएगा।

114.1

सीता-लखन-सहित रघुराई । गाँव निकट जब निकसहिं जाई ॥
सुनि सब बाल बृद्ध नर-नारी । चलहिँ तुरत गृह-काज बिसारी ॥

sītā-lakhana-sahita raghurāī | gām̐va nikaṭa jaba nikasahiṃ jāī ||
suni saba bāla bṛddha nara-nārī | calahim̐ turata gṛha-kāja bisārī ||

114.2

राम-लखन-सिय रूप निहारी । पाइ नयनफलु होहिँ सुखारी ॥
सजल-बिलोचन पुलक-सरीरा । सब भये मगन देखि दोउ बीरा ॥

rāma-lakhana-siya rūpa nihārī | pāi nayanaphalu hohim̐ sukhārī ||
sajala-bilocana pulaka-sarīrā | saba bhaye magana dekhi dou bīrā ||

114.3

बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी । लहि जनु रङ्कन्ह सुरमनि-ढेरी ॥
एकन्ह एक बोलि सिख देहीं । लोचन लाहु लेहु छन एहीँ ॥

barani na jāi dasā tinha kerī | lahi janu raṅkanha suramani-ḍherī ||
ekanha eka boli sikha dehīṃ | locana lāhu lehu chana ehīm̐ ||

114.4

रामहिँ देखि एक अनुरागे । चितवत चले जाहिँ सँग लागे ॥
एक नयन-मग छबि उर आनी । होहिँ सिथिल-तन-मन-बर-मानी ॥

rāmahim̐ dekhi eka anurāge | citavata cale jāhim̐ sam̐ga lāge ||
eka nayana-maga chabi ura ānī | hohim̐ sithila-tana-mana-bara-mānī ||

दो॰ 114दोहा

एक देखिं बट-छाँह भलि, डासि मृदुल तृन पात ।
कहहिँ गवाँइअ छिनुकु सम, गवनब अबहिँ कि प्रात ॥

eka dekhiṃ baṭa-chām̐ha bhali, ḍāsi mṛdula tṛna pāta |
kahahim̐ gavām̐ia chinuku sama, gavanaba abahim̐ ki prāta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0