अयोध्याकाण्ड

अध्याय 107: भरद्वाज का सत्कार और प्रेम का वरदान

5 श्लोक · 107 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

भरद्वाज का सत्कार और प्रेम का वरदान

मुनि ने कुशल पूछकर आसन दिए और प्रेम से भरपूर पूजा की। वे अच्छे कन्द, मूल, फल और अंकुर ले आए, मानो अमृत के बने हों। सीता, लक्ष्मण और सेवक सहित राम ने बड़ी रुचि से मूल फल खाए और थकान मिटने से सुखी हुए। तब भरद्वाज कोमल वचन बोले। आज मेरा तप, तीर्थ और त्याग सफल हुआ, आज जप, योग और वैराग्य सफल हुए। हे राम, आपको देखकर सब शुभ साधनों का साज सफल हो गया। आपके दर्शन से सब आशाएँ पूरी हुईं। अब कृपा करके यह वर दीजिए कि आपके चरणकमलों में सहज स्नेह हो। जब तक मनुष्य कर्म, वचन और मन से छल छोड़कर आपका दास नहीं होता, तब तक करोड़ों उपाय करने पर भी उसे सपने में भी सुख नहीं मिलता।

107.1

कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे । पूजि प्रेम-परिपूरन कीन्हे ॥
कन्द मूल फल अङ्कुर नीके । दिये आनि मुनि मनहुँ अमी के ॥

kusala prasna kari āsana dīnhe | pūji prema-paripūrana kīnhe ||
kanda mūla phala aṅkura nīke | diye āni muni manahum̐ amī ke ||

107.2

सीय लखन जन सहित सुहाये । अति रुचि राम मूल फल खाये ॥
भये बिगत-खम राम सुखारे । भरद्वाज मृदु-बचन उचारे ॥

sīya lakhana jana sahita suhāye | ati ruci rāma mūla phala khāye ||
bhaye bigata-khama rāma sukhāre | bharadvāja mṛdu-bacana ucāre ||

107.3

आजु सुफल तप तीरथ त्यागू । आजु सुफल जप जोग बिरागू ॥
सफल सकल सुभ-साधन-साजू । राम तुम्हहिँ अवलोकत आजू ॥

āju suphala tapa tīratha tyāgū | āju suphala japa joga birāgū ||
saphala sakala subha-sādhana-sājū | rāma tumhahim̐ avalokata ājū ||

107.4

लाभ-अवधि सुख-अवधि न दूजी । तुम्हारें दरस आस सब पूजी ॥
अब करि कृपा देहु बर एहू । निज-पद-सरसिज सहज सनेहू ॥

lābha-avadhi sukha-avadhi na dūjī | tumhāreṃ darasa āsa saba pūjī ||
aba kari kṛpā dehu bara ehū | nija-pada-sarasija sahaja sanehū ||

दो॰ 107दोहा

करम बचन मन छाड़ि-छल, जब लगि जन न तुम्हार ।
तब लगि सुख सपनेहुँ नहीं, किये कोटि उपचार ॥

karama bacana mana chār̤i-chala, jaba lagi jana na tumhāra |
taba lagi sukha sapanehum̐ nahīṃ, kiye koṭi upacāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0