अयोध्याकाण्ड

अध्याय 100: केवट का हठ, पहले चरण पखारूँगा

6 श्लोक · 100 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

केवट का हठ, पहले चरण पखारूँगा

जिसके वियोग में पशु ऐसे व्याकुल हैं, उसके बिना प्रजा और माता पिता कैसे जिएँगे? श्रीराम ने सुमन्त्र को बरबस लौटाया और गंगा तट पर आए। नाव माँगी, पर केवट नहीं लाया। वह बोला, मैं आपका भेद जानता हूँ, सब कहते हैं कि आपके चरणों की धूल में मनुष्य बना देने वाली जड़ी है। उसे छूते ही शिला सुन्दर स्त्री हो गई, और काठ पत्थर से कठोर नहीं। मेरी नाव भी मुनि की पत्नी बनकर उड़ जाएगी, इसी से परिवार पलता है। यदि प्रभु पार जाना चाहें तो मुझे चरण पखारने दें। आपकी और दशरथ की सौगन्ध, उतराई नहीं चाहता, लक्ष्मण चाहे बाण मारें, पर चरण धोए बिना पार नहीं उतारूँगा। ये प्रेम भरे अटपटे वचन सुनकर करुणानिधान हँसे और जानकी तथा लक्ष्मण की ओर देखा।

100.1

जासु बियोग बिकल पसु ऐसे । प्रजा मातु पितु जीहहिँ कैसें ॥
बरबस राम सुमन्त्र पठाये । सुरसरि-तीर आपु तब आये ॥

jāsu biyoga bikala pasu aise | prajā mātu pitu jīhahim̐ kaiseṃ ||
barabasa rāma sumantra paṭhāye | surasari-tīra āpu taba āye ||

100.2

मागी नाव न केवट आना । कहइ तुम्हार मरम में जाना ॥
चरन कमल रज कहुँ सब कहई । मानुष-करनि मूरि-कछु अहई ॥

māgī nāva na kevaṭa ānā | kahai tumhāra marama meṃ jānā ||
carana kamala raja kahum̐ saba kahaī | mānuṣa-karani mūri-kachu ahaī ||

100.3

छुअत सिला भइ नारि सुहाई । पाहन तेँ न काठ कठिनाई ॥
तरनिउँ मुनि घरिनि होइ जाई । बाट परइ मोरि नाव उड़ाई ॥

chuata silā bhai nāri suhāī | pāhana tem̐ na kāṭha kaṭhināī ||
taranium̐ muni gharini hoi jāī | bāṭa parai mori nāva ur̤āī ||

100.4

एहिं प्रतिपालउँ सब परिवारू । नहिं जानउँ कछु अउर कबारू ॥
जौ प्रभु पार अवसि गा चहहू । मोहि पद-पदुम पखारन कहहू ॥

ehiṃ pratipālaum̐ saba parivārū | nahiṃ jānaum̐ kachu aura kabārū ||
jau prabhu pāra avasi gā cahahū | mohi pada-paduma pakhārana kahahū ||

100.छं॰ 1छन्द

पद-कमल धोइ चढाइ नाव न, नाथ उतराई चहौं ।
मोहि राम राउरि-आन दसरथ, सपथ सब साँची कहाँ ॥
बरु तीर मारहुँ लखन पै जब, लगि न पाय पखारिहौँ ।
तब लगि न तुलसीदास-नाथ, कृपाल पार उतारिहौं ॥

pada-kamala dhoi caḍhāi nāva na, nātha utarāī cahauṃ |
mohi rāma rāuri-āna dasaratha, sapatha saba sām̐cī kahām̐ ||
baru tīra mārahum̐ lakhana pai jaba, lagi na pāya pakhārihaum̐ |
taba lagi na tulasīdāsa-nātha, kṛpāla pāra utārihauṃ ||

100.सो॰ 100सोरठा

सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे ।
बिहसे करुनाऐन, चितइ जानकी लखन-तन ॥

suni kevaṭa ke baina, prema lapeṭe aṭapaṭe |
bihase karunāaina, citai jānakī lakhana-tana ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0