अयोध्याकाण्ड

अध्याय 99: सुमन्त्र का लौटना, घोड़े भी शोकाकुल

5 श्लोक · 99 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

सुमन्त्र का लौटना, घोड़े भी शोकाकुल

सीता कहती हैं, प्राणनाथ और धनुष तरकश धारी वीर देवर साथ हैं, इसलिए मार्ग में मुझे थकान या दुख नहीं, भूलकर भी मेरा सोच न करें। सीता की शीतल वाणी सुनकर सुमन्त्र ऐसे व्याकुल हुए जैसे साँप की मणि खो गई हो, न आँखों से सूझता है, न कानों से सुनता है, न कुछ कह पाते हैं। श्रीराम ने बहुत समझाया, फिर भी छाती ठण्डी नहीं हुई। साथ चलने के लिए उन्होंने अनेक यत्न किए और रघुनन्दन ने हर एक का उचित उत्तर दिया। राम की आज्ञा मेटी नहीं जाती, कर्म की गति कठिन है। तीनों के चरणों में सिर नवाकर वे ऐसे लौटे जैसे व्यापारी पूँजी गँवाकर लौटे। घोड़े बार बार राम की ओर देखकर हिनहिनाते हैं, यह देख निषाद सिर धुनते हैं।

99.1

प्राननाथ प्रिय देवर साथा । बीर-धुरीन धरें धनु भाथा ॥
नहिँ मग सम भ्रम दुख मन मोरें । मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें ॥

prānanātha priya devara sāthā | bīra-dhurīna dhareṃ dhanu bhāthā ||
nahim̐ maga sama bhrama dukha mana moreṃ | mohi lagi socu karia jani bhoreṃ ||

99.2

सुनि सुमन्त्र सिय-सीतलि-बानी । भयउ बिकल जनु फनि-मनि-हानी ॥
नयन सूझ नहिँ सुनइ न काना । कहि न सकइ कछु अति अकुलाना ॥

suni sumantra siya-sītali-bānī | bhayau bikala janu phani-mani-hānī ||
nayana sūjha nahim̐ sunai na kānā | kahi na sakai kachu ati akulānā ||

99.3

राम प्रबोध कीन्ह बहु भाँती । तदपि होति नहिँ सीतल छाती ॥
जतन अनेक साथ हित कीन्हे । उचित उतर रघुनन्दन दीन्हे ॥

rāma prabodha kīnha bahu bhām̐tī | tadapi hoti nahim̐ sītala chātī ||
jatana aneka sātha hita kīnhe | ucita utara raghunandana dīnhe ||

99.4

मेटि जाइ नहिँ राम रजाई । कठिन करम गति कछु न बसाई ॥
राम-लखन सिय पद सिर नाई । फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई ॥

meṭi jāi nahim̐ rāma rajāī | kaṭhina karama gati kachu na basāī ||
rāma-lakhana siya pada sira nāī | phireu banika jimi mūra gavām̐ī ||

दो॰ 99दोहा

रथ हाँकेउ हय राम-तन, हेरि हेरि हिहिनाहिं ।
देखि निषाद बिषाद-बस, धुनहिँ सीस पछिताहिँ ॥

ratha hām̐keu haya rāma-tana, heri heri hihināhiṃ |
dekhi niṣāda biṣāda-basa, dhunahim̐ sīsa pachitāhim̐ ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0