सीता कहती हैं, प्राणनाथ और धनुष तरकश धारी वीर देवर साथ हैं, इसलिए मार्ग में मुझे थकान या दुख नहीं, भूलकर भी मेरा सोच न करें। सीता की शीतल वाणी सुनकर सुमन्त्र ऐसे व्याकुल हुए जैसे साँप की मणि खो गई हो, न आँखों से सूझता है, न कानों से सुनता है, न कुछ कह पाते हैं। श्रीराम ने बहुत समझाया, फिर भी छाती ठण्डी नहीं हुई। साथ चलने के लिए उन्होंने अनेक यत्न किए और रघुनन्दन ने हर एक का उचित उत्तर दिया। राम की आज्ञा मेटी नहीं जाती, कर्म की गति कठिन है। तीनों के चरणों में सिर नवाकर वे ऐसे लौटे जैसे व्यापारी पूँजी गँवाकर लौटे। घोड़े बार बार राम की ओर देखकर हिनहिनाते हैं, यह देख निषाद सिर धुनते हैं।