अयोध्याकाण्ड

अध्याय 1: मंगलाचरण और विवाह के बाद अवध का आनन्द

9 श्लोक · 1 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

मंगलाचरण और विवाह के बाद अवध का आनन्द

तुलसीदास काण्ड का आरम्भ तीन संस्कृत श्लोकों से करते हैं। पहले में उन श्रीशंकर से रक्षा की प्रार्थना है जिनके वाम भाग में पार्वती, मस्तक पर गंगा, ललाट पर बालचन्द्र, कण्ठ में विष और वक्ष पर नागराज हैं। दूसरे में श्रीराम के उस मुखकमल की वन्दना है जो अभिषेक की बात से न खिला और वनवास के दुःख से न मुरझाया। तीसरे में सीता सहित, धनुष-बाण धारी श्याम कोमल श्रीराम को प्रणाम है। फिर चौपाइयाँ बताती हैं कि श्रीराम के विवाह कर लौटने के बाद अवध में नित नए मंगल होने लगे और सम्पत्ति नदियों की तरह उमड़कर अवध रूपी सागर में आने लगी। सब उनका मुखचन्द्र निहारकर सुखी हैं और महेश से मनाते हैं कि राजा अपने रहते श्रीराम को युवराज बना दें।

1.श्लो॰ 1

यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके ।
भाले बाल-विधुर्गले च गरलं यस्योरसि ब्यालराट् ॥
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्बदा ।
शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम् ॥

yasyāṅke ca vibhāti bhūdharasutā devāpagā mastake |
bhāle bāla-vidhurgale ca garalaṃ yasyorasi byālarāṭ ||
so'yaṃ bhūtivibhūṣaṇaḥ suravaraḥ sarvādhipaḥ sarbadā |
śarvaḥ sarvagataḥ śivaḥ śaśinibhaḥ śrīśaṅkaraḥ pātu mām ||

1.श्लो॰ 2

प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवास दुःखतः ।
मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमंगलप्रदा ॥

prasannatāṃ yā na gatābhiṣekatastathā na mamle vanavāsa duḥkhataḥ |
mukhāmbujaśrī raghunandanasya me sadāstu sā mañjulamaṃgalapradā ||

1.श्लो॰ 3

नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम् ।
पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंश नाथम् ॥

nīlāmbujaśyāmalakomalāṅgaṃ sītāsamāropitavāmabhāgam |
pāṇau mahāsāyakacārucāpaṃ namāmi rāmaṃ raghuvaṃśa nātham ||

दो॰ 1दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर-बिमल जस, जो दायक फल-चारि ॥

śrīguru carana saroja raja, nija manu mukuru sudhāri |
baranaum̐ raghubara-bimala jasa, jo dāyaka phala-cāri ||

1.1

जब तें राम ब्याहि घर आये । नित नव मङ्गल मोद बधाये ॥
भुवन चारि-दस भूधर भारी । सुकृत मेघ बरषहिं सुख-बारी ॥

jaba teṃ rāma byāhi ghara āye | nita nava maṅgala moda badhāye ||
bhuvana cāri-dasa bhūdhara bhārī | sukṛta megha baraṣahiṃ sukha-bārī ||

1.2

रिधि सिधि सम्पति नदीं सुहाई । उमगि अवध-अम्बुधि कहँ आई ॥
मनि-गन पुर-नर-नारि-सुजाती । सुचि अमोल सुन्दर सब भाँती ॥

ridhi sidhi sampati nadīṃ suhāī | umagi avadha-ambudhi kaham̐ āī ||
mani-gana pura-nara-nāri-sujātī | suci amola sundara saba bhām̐tī ||

1.3

कहि न जाइ कछु नगर बिभूती । जनु एतनिअ बिरञ्चि करतूती ॥
सब विधि सब पुर-लोग सुखारी । रामचन्द मुख-चन्द निहारी ॥

kahi na jāi kachu nagara bibhūtī | janu etania birañci karatūtī ||
saba vidhi saba pura-loga sukhārī | rāmacanda mukha-canda nihārī ||

1.4

मुदित मातु सब सखीं सहेली । फलित बिलोकि मनोरथ बेली ॥
राम-रूप-गुन-सील-सुभाऊ । प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ ॥

mudita mātu saba sakhīṃ sahelī | phalita biloki manoratha belī ||
rāma-rūpa-guna-sīla-subhāū | pramudita hoi dekhi suni rāū ||

दो॰ 1दोहा

सब कें उर अभिलाष अस, कहहिँ मनाइ महेस ।
आपु अछत जुबराज-पद, रामहिँ देउ नरेस ॥

saba keṃ ura abhilāṣa asa, kahahim̐ manāi mahesa |
āpu achata jubarāja-pada, rāmahim̐ deu naresa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0