अस कहि जोग-अगिनि तनु जारा । राम कृपाँ बैकुंठ सिधारां ॥
ता ते मुनि हरि लीन न भयऊ । प्रथमहिँ भेद-भगति बर लयऊ ॥
asa kahi joga-agini tanu jārā | rāma kṛpām̐ baikuṃṭha sidhārāṃ ||
tā te muni hari līna na bhayaū | prathamahim̐ bheda-bhagati bara layaū ||
5 श्लोक · 9 में से 46
यह कहकर शरभंग ने योगाग्नि में शरीर जला दिया और राम-कृपा से वैकुण्ठ गए। वे हरि में लीन नहीं हुए, क्योंकि उन्होंने पहले ही भेद-भक्ति का वर ले लिया था। मुनिवर की यह गति देखकर ऋषि-समूह सुखी हुआ और सबने स्तुति की: शरणागत के हितकारी करुणाकन्द की जय। फिर रघुनाथ वन में आगे चले, बहुत-से मुनि साथ हो लिए। हड्डियों का ढेर देखकर प्रभु ने दया से पूछा कि यह क्या है। मुनियों ने कहा: आप सर्वदर्शी अन्तर्यामी होकर भी क्यों पूछते हैं? राक्षसों ने इन सब मुनियों को खा डाला। यह सुनकर रघुनाथ के नेत्रों में जल भर आया। उन्होंने भुजा उठाकर प्रण किया कि पृथ्वी को राक्षसों से रहित करूँगा, और आश्रम-आश्रम जाकर सब मुनियों को सुख दिया।
अस कहि जोग-अगिनि तनु जारा । राम कृपाँ बैकुंठ सिधारां ॥
ता ते मुनि हरि लीन न भयऊ । प्रथमहिँ भेद-भगति बर लयऊ ॥
asa kahi joga-agini tanu jārā | rāma kṛpām̐ baikuṃṭha sidhārāṃ ||
tā te muni hari līna na bhayaū | prathamahim̐ bheda-bhagati bara layaū ||
रिषि-निकाय मुनिबर-गति देखी । सुखी भए निज हृदयँ विसेखी ॥
अस्तुति करहिं सकल मुनि बृन्दा । जयति प्रनत-हित करुना कन्दा ॥
riṣi-nikāya munibara-gati dekhī | sukhī bhae nija hṛdayam̐ visekhī ||
astuti karahiṃ sakala muni bṛndā | jayati pranata-hita karunā kandā ||
पुनि रघुनाथ चले बन आगे । मुनिवर बृन्द बिपुल सँग लागे ॥
अस्थि समूह देखि रघुराया । पूछा मुनिन्ह लागि अति दाया ॥
puni raghunātha cale bana āge | munivara bṛnda bipula sam̐ga lāge ||
asthi samūha dekhi raghurāyā | pūchā muninha lāgi ati dāyā ||
जानतहू पूछिअ कस स्वामी । सबदरसी तुम्ह अन्तरजामी ॥
निसिचर-निकर सकल मुनि खाये । सुनि रघुनाथ नयन जल छाये ॥
jānatahū pūchia kasa svāmī | sabadarasī tumha antarajāmī ||
nisicara-nikara sakala muni khāye | suni raghunātha nayana jala chāye ||
निसिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ पन कीन्ह ।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि, जाइ जाइ सुख दीन्ह ॥
nisicara hīna karaum̐ mahi, bhuja uṭhāi pana kīnha |
sakala muninha ke āśramanhi, jāi jāi sukha dīnha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0