कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला । सङ्कर मानस राजमराला ॥
जात रहेउँ बिरञ्चि के धामा । सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा ॥
kaha muni sunu raghubīra kṛpālā | saṅkara mānasa rājamarālā ||
jāta raheum̐ birañci ke dhāmā | suneum̐ śravana bana aihahiṃ rāmā ||
5 श्लोक · 8 में से 46
शरभंग कहते हैं: हे कृपालु रघुवीर, शंकर के मानस के राजहंस, मैं ब्रह्मलोक जा रहा था कि कानों में सुना, राम इस वन में आएँगे। तब से दिन-रात मार्ग देखता रहा, अब प्रभु को देखकर छाती शीतल हुई। मैं सब साधनों से हीन हूँ; आपने दीन जानकर कृपा की। यह मुझ पर कोई उपकार नहीं, आपने अपना प्रण निभाया है, हे भक्तों के मन चुराने वाले। जब तक मैं देह छोड़कर आपसे न मिलूँ, तब तक यहीं ठहरिए। अपने सब योग, यज्ञ, जप, तप और व्रत प्रभु को अर्पित कर वे बदले में भक्ति का वर लेते हैं। फिर चिता रचकर, सब आसक्ति छोड़कर उस पर बैठते हैं और कहते हैं: नील मेघ-से श्याम श्रीराम, सीता और अनुज सहित इसी सगुण रूप में मेरे हृदय में सदा बसिए।
कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला । सङ्कर मानस राजमराला ॥
जात रहेउँ बिरञ्चि के धामा । सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा ॥
kaha muni sunu raghubīra kṛpālā | saṅkara mānasa rājamarālā ||
jāta raheum̐ birañci ke dhāmā | suneum̐ śravana bana aihahiṃ rāmā ||
चितवत पंथ रहेउँ दिन राती । अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती ॥
नाथ सकल साधन मैं हीना । कीन्ही कृपा जानि जन दीना ॥
citavata paṃtha raheum̐ dina rātī | aba prabhu dekhi jur̤ānī chātī ||
nātha sakala sādhana maiṃ hīnā | kīnhī kṛpā jāni jana dīnā ||
सो कछु देव न मोहि निहोरा । निज पन राखेउ जन-मन-चोरा ॥
तब लगि रहहु दीन हित लागी । जब लगि मिलौं तुम्हहिँ तनु त्यागी ॥
so kachu deva na mohi nihorā | nija pana rākheu jana-mana-corā ||
taba lagi rahahu dīna hita lāgī | jaba lagi milauṃ tumhahim̐ tanu tyāgī ||
जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा । प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा ॥
एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा । बैठे हृदयँ छाडि सब सङ्गा ॥
joga jagya japa tapa brata kīnhā | prabhu kaham̐ dei bhagati bara līnhā ||
ehi bidhi sara raci muni sarabhaṃgā | baiṭhe hṛdayam̐ chāḍi saba saṅgā ||
सीता-अनुज समेत प्रभु, नील-जलद-तनु स्याम ।
मम हियँ बसहु निरन्तर, सगुनरुप श्रीराम ॥
sītā-anuja sameta prabhu, nīla-jalada-tanu syāma |
mama hiyam̐ basahu nirantara, sagunarupa śrīrāma ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0