अरण्यकाण्ड

अध्याय 46: सन्तों के और लक्षण; अरण्यकाण्ड पूर्ण

इति श्रीरामचरितमानसे सकल कलि कलुष विध्वंसने विमल वैराग्य सम्पादनो नाम तृतीयः सोपानः समाप्तः ।

7 श्लोक · 46 में से 46

इस अध्याय में क्या होता है

सन्तों के और लक्षण; अरण्यकाण्ड पूर्ण

राम आगे कहते हैं: सन्त अपनी प्रशंसा सुनकर सकुचाते हैं और दूसरों के गुण सुनकर अधिक हर्षित होते हैं। वे सरल हैं और सबसे प्रेम करते हैं। उनमें जप, तप और व्रत हैं, गुरु, गोविन्द और ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम है, और श्रद्धा, क्षमा और दया है। उनमें वैराग्य, विवेक और विनय है; वे दम्भ, मान या मद कभी नहीं करते और बिना स्वार्थ परहित में लगे रहते हैं। उनके सब गुण शारदा और वेद भी नहीं कह सकते। नारद प्रभु के चरण पकड़कर ब्रह्मलोक चले गए। तुलसीदास कहते हैं: रावणारि का पावन यश गाने-सुनने वाले बिना जप-योग के दृढ़ राम-भक्ति पाते हैं। युवती का शरीर दीपक की लौ है, मन, पतंगा मत बन। पुष्पिका से तीसरा सोपान, अरण्यकाण्ड, पूर्ण होता है।

46.1

निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीँ । पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं ॥
सम सीतल नहिँ त्यागहिं नीती । सरल सुभाउ सबहिँ सन प्रीती ॥

nija guna śravana sunata sakucāhīm̐ | para guna sunata adhika haraṣāhīṃ ||
sama sītala nahim̐ tyāgahiṃ nītī | sarala subhāu sabahim̐ sana prītī ||

46.2

जप तप ब्रत दम सञ्जम नेमा । गुरु-गोबिन्द-बिप्र-पद प्रेमा ॥
श्रद्धा छमा मयत्री दाया । मुदिता मम-पद-प्रीति अमाया ॥

japa tapa brata dama sañjama nemā | guru-gobinda-bipra-pada premā ||
śraddhā chamā mayatrī dāyā | muditā mama-pada-prīti amāyā ||

46.3

बिरति बिबेक बिनय बिज्ञाना । बोध जथारथ बेद पुराना ॥
दम्भ मान मद करहिं न काऊ । भूलि न देहिँ कुमारग पाऊ ॥

birati bibeka binaya bijñānā | bodha jathāratha beda purānā ||
dambha māna mada karahiṃ na kāū | bhūli na dehim̐ kumāraga pāū ||

46.4

गावहिं सुनहिँ सदा मम लीला । हेतु रहित पर-हित-रत-सीला ॥
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते । कहि न सकहिँ सारद श्रुति तेते ॥

gāvahiṃ sunahim̐ sadā mama līlā | hetu rahita para-hita-rata-sīlā ||
muni sunu sādhunha ke guna jete | kahi na sakahim̐ sārada śruti tete ||

46.छं॰ 1छन्द

कहि सक न सारद सेष नारद, सुनत पद-पङ्कज गहे ।
अस दीनबन्धु कृपाल अपने, भगत गुन निज-मुख कहे ॥
सिर नाइ बारहिँ बार चरनन्हि, ब्रह्मपुर नारद गये ।
ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए ॥

kahi saka na sārada seṣa nārada, sunata pada-paṅkaja gahe |
asa dīnabandhu kṛpāla apane, bhagata guna nija-mukha kahe ||
sira nāi bārahim̐ bāra carananhi, brahmapura nārada gaye |
te dhanya tulasīdāsa āsa bihāi je hari ram̐ga ram̐e ||

दो॰ 46 (क)दोहा

रावनारि जसु पावन, गावहिं सुनहिँ जे लोग ।
राम भगति दृढ़ पावहिँ, बिनु बिराग जप जोग ॥

rāvanāri jasu pāvana, gāvahiṃ sunahim̐ je loga |
rāma bhagati dṛr̤ha pāvahim̐, binu birāga japa joga ||

दो॰ 46 (ख)दोहा

दीप-सिखा सम जुबति तन, मन जनि होसि पतङ्ग ।
भजहि राम तजि काम मद, करहि सदा सतसङ्ग ॥

dīpa-sikhā sama jubati tana, mana jani hosi pataṅga |
bhajahi rāma taji kāma mada, karahi sadā satasaṅga ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0