किष्किन्धाकाण्ड

अध्याय 1: ऋष्यमूक पर हनुमान का दो धनुर्धरों से मिलना

10 श्लोक · 1 में से 30

इस अध्याय में क्या होता है

ऋष्यमूक पर हनुमान का दो धनुर्धरों से मिलना

दो संस्कृत श्लोक सीता को खोजते, मनुष्य रूप में भगवान श्रीराम और लक्ष्मण की तथा उस राम-नाम-अमृत की वन्दना करते हैं जिसे शम्भु सदा पीते हैं। सोरठा पूछता है कि जहाँ शिव और भवानी बसते हैं, उस काशी का सेवन क्यों न करें; दोहा उस मन्द मन को धिक्कारता है जो देवों को जलाने वाला विष पीने वाले शंकर को नहीं भजता। फिर श्रीराम ऋष्यमूक पर्वत के निकट आते हैं। सुग्रीव दोनों बलवान भाइयों को देखकर डरते हैं और हनुमान को ब्रह्मचारी के वेश में भेजते हैं कि जानो, कहीं बालि ने तो नहीं भेजा। हनुमान प्रणाम कर पूछते हैं: तुम त्रिदेवों में से हो, नर-नारायण हो, या जगत के स्वामी मनुष्य बनकर आए हो?

1.श्लो॰ 1

कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ ।
शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ ॥
मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौं हितौ ।
सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः ॥

kundendīvarasundarāvatibalau vijñānadhāmāvubhau |
śobhāḍhyau varadhanvinau śrutinutau govipravṛndapriyau ||
māyāmānuṣarūpiṇau raghuvarau saddharmavarmauṃ hitau |
sītānveṣaṇatatparau pathigatau bhaktipradau tau hi naḥ ||

1.श्लो॰ 2

ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं ।
श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा ॥
संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं ।
धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम् ॥

brahmāmbhodhisamudbhavaṃ kalimalapradhvaṃsanaṃ cāvyayaṃ |
śrīmacchambhumukhendusundaravare saṃśobhitaṃ sarvadā ||
saṃsārāmayabheṣajaṃ sukhakaraṃ śrījānakījīvanaṃ |
dhanyāste kṛtinaḥ pibanti satataṃ śrīrāmanāmāmṛtam ||

1.सो॰ 1सोरठा

मुक्ति जन्म-महि जानि, ज्ञान खानि अघ हानि कर ।
जहँ बस सम्भु भवानि, सो कासी सेइअ कस न ॥

mukti janma-mahi jāni, jñāna khāni agha hāni kara |
jaham̐ basa sambhu bhavāni, so kāsī seia kasa na ||

दो॰ 1दोहा

जरत सकल सुर-बृन्द, विषम गरल जेहिं पान किय ।
तेहि न भजसि मन मन्द, को कृपाल सङ्कर सरिस ॥

jarata sakala sura-bṛnda, viṣama garala jehiṃ pāna kiya |
tehi na bhajasi mana manda, ko kṛpāla saṅkara sarisa ||

1.1

आगें चले बहुरि रघुराया । रिष्यमूक-परवत निअराया ॥
तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवाँ । आवत देखि अतुल-बल-सीवाँ ॥

āgeṃ cale bahuri raghurāyā | riṣyamūka-paravata niarāyā ||
taham̐ raha saciva sahita sugrīvām̐ | āvata dekhi atula-bala-sīvām̐ ||

1.2

अति सभीत कह सुनु हनुमाना । पुरुष जुगल बल-रूप-निधाना ॥
धरि बटु रूप देखु तैं जाई । कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई ॥

ati sabhīta kaha sunu hanumānā | puruṣa jugala bala-rūpa-nidhānā ||
dhari baṭu rūpa dekhu taiṃ jāī | kahesu jāni jiyam̐ sayana bujhāī ||

1.3

पठये बालि होहिँ मन मैला । भागौं तुरत तजउँ यह सैला ॥
बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ । माथ नाइ पूछत अस भयऊ ॥

paṭhaye bāli hohim̐ mana mailā | bhāgauṃ turata tajaum̐ yaha sailā ||
bipra rūpa dhari kapi taham̐ gayaū | mātha nāi pūchata asa bhayaū ||

1.4

को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा । छत्री रूप फिरहु बन बीरा ॥
कठिन-भूमि कोमल-पद-गामी । कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी ॥

ko tumha syāmala gaura sarīrā | chatrī rūpa phirahu bana bīrā ||
kaṭhina-bhūmi komala-pada-gāmī | kavana hetu bicarahu bana svāmī ||

1.5

मृदुल मनोहर सुन्दर गाता । सहत दुसह बन आतप-बाता ॥
की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ । नर-नारायन की तुम्ह दोऊ ॥

mṛdula manohara sundara gātā | sahata dusaha bana ātapa-bātā ||
kī tumha tīni deva maham̐ koū | nara-nārāyana kī tumha doū ||

दो॰ 1दोहा

जग-कारन तारन-भव, भञ्जन धरनी भार ।
की तुम्ह अखिल-भुवन-पति, लीन्ह मनुज अवतार ॥

jaga-kārana tārana-bhava, bhañjana dharanī bhāra |
kī tumha akhila-bhuvana-pati, līnha manuja avatāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0