सुनि रघुपति के बचन सुहाये । मुनि तन पुलक नयन भरि आये ॥
कहहु कवन प्रभु कै असि रीती । सेवक पर ममता अरु प्रीती ॥
suni raghupati ke bacana suhāye | muni tana pulaka nayana bhari āye ||
kahahu kavana prabhu kai asi rītī | sevaka para mamatā aru prītī ||
6 श्लोक · 45 में से 46
रघुपति के सुहावने वचन सुनकर मुनि का शरीर पुलकित हुआ और नेत्र भर आए। वे बोले: कहिए, किस स्वामी की ऐसी रीति है कि सेवक पर ऐसी ममता और प्रीति हो? फिर नारद आदर से बोले: हे विज्ञान-विशारद राम सन्तों के लक्षण कहिए। प्रभु बोले: मुनि, सन्तों के वे गुण सुनो जिनके कारण मैं उनके वश में रहता हूँ। वे छह विकारों को जीते हुए, पापरहित, निष्काम, अचल, अकिंचन, पवित्र और सुख के धाम होते हैं। वे इच्छारहित, सत्यनिष्ठ, विद्वान, योगी, दूसरों को मान देने वाले, मदरहित और भक्ति-मार्ग में परम प्रवीण। वे गुणों के धाम, संसार के दुखों से रहित और सन्देह-रहित होते हैं, और मेरे चरणकमलों को छोड़कर उन्हें न देह प्रिय है, न घर।
सुनि रघुपति के बचन सुहाये । मुनि तन पुलक नयन भरि आये ॥
कहहु कवन प्रभु कै असि रीती । सेवक पर ममता अरु प्रीती ॥
suni raghupati ke bacana suhāye | muni tana pulaka nayana bhari āye ||
kahahu kavana prabhu kai asi rītī | sevaka para mamatā aru prītī ||
जे न भजहिँ अस प्रभु भ्रम त्यागी । ज्ञान-रङ्क नर मन्द अभागी ॥
पुनि सादर बोले मुनि नारद । सुनहु राम बिज्ञान बिसारद ॥
je na bhajahim̐ asa prabhu bhrama tyāgī | jñāna-raṅka nara manda abhāgī ||
puni sādara bole muni nārada | sunahu rāma bijñāna bisārada ||
सन्तन्ह के लच्छन रघुबीरा । कहहु नाथ भव भञ्जन भीरा ॥
सुनु मुनि सन्तन्ह के गुन कहऊँ । जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ ॥
santanha ke lacchana raghubīrā | kahahu nātha bhava bhañjana bhīrā ||
sunu muni santanha ke guna kahaūm̐ | jinha te maiṃ unha keṃ basa rahaūm̐ ||
षट-बिकार-जित अनघ अकामा । अचल अकिञ्चन सुचि सुख-धामा ॥
अमित-बाघ अनीह मित-भोगी । सत्यसार कबि कोबिद जोगी ॥
ṣaṭa-bikāra-jita anagha akāmā | acala akiñcana suci sukha-dhāmā ||
amita-bāgha anīha mita-bhogī | satyasāra kabi kobida jogī ||
सावधान मानद मद-हीना । धीर भगति-पथ परम-प्रबीना ॥
sāvadhāna mānada mada-hīnā | dhīra bhagati-patha parama-prabīnā ||
गुनागार संसार-दुख,-रहित बिगत सन्देह ।
तजि मम चरन-सरोज प्रिय, जिन्ह कह देह न गेह ॥
gunāgāra saṃsāra-dukha,-rahita bigata sandeha |
taji mama carana-saroja priya, jinha kaha deha na geha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0